भारतीय पुलिस ब्यवस्था : डा. चतुरानन ओझा 
June 18, 2020 • गुरुकुल वाणी

सच यह है कि भारत में पुलिसिंग की जो व्यवस्था है, वह यूरोप, खासकर इंग्लैंड की बनाई हुई है. 

आपके राष्ट्रीय स्वाभिमान को धक्का न लगे तो यह स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए कि आजादी से लेकर आज तक जिस व्यवस्था के तहत हम चल रहे हैं, यानी शासित हो रहे हैं, वह पूरी की पूरी व्यवस्था ही अंग्रेजों की बनाई हुई है. 

ऐसा नहीं है कि हमारे पास इसका विकल्प नहीं था. सच यह है कि था. गांधी ने बार-बार उसी विकल्प की बात की थी. डॉ. अंबेडकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, लोहिया और कई और लोग इस विषय पर उनके साथ थे. लेकिन जब लागू करने की बात आई तो साठ पार वाला मानकर उनका मज़ाक उड़ाया गया और अंततः हुआ वही जिससे मुक्ति की आकांक्षा थी. भोजपुरी में कहूँ तो कहना होगा- जौने सास से अलगे भइलीं, उहे परलीं बखरा. 

तो ख़ैर, हमारी पुलिसिंग भी उन्हीं व्यवस्थाओं में से एक है. 

लेकिन इसके और उनके होने में बड़ा अंतर है.

केवल ब्रिटेन ही नहीं, यूरोप के लगभग उस पूरे हिस्से में जो कि लोकतांत्रिक है, कहीं भी पुलिसिंग वही नहीं है, जो कि भारत में है. 

ऐसा भी नहीं है कि यह अंतर कोई आज आया है. यह अंतर शुरू से है. 

शुरू से इसलिए है क्योंकि अंग्रेज यहाँ शासन करने आए थे. व्यवस्था बनाने नहीं. व्यवस्था की जरूरत उन्हें अपने देश में थी. तो वहाँ उन्होंने सब कायदे के इंतजाम बनाए. आपको जान-बूझकर लतखोर बनाया. 

आपको लतखोर बनाने के लिए ही इन्होंने यह पुलिस बनाई थी. इसलिए पुलिस में ऐसे किसी शख्स को रखा ही नहीं, जिसका बुद्धि से कभी कोई संबंध रहा हो या भविष्य में कभी ऐसा कुछ होने की लेशमात्र भी आशंका हो. 

पुलिस में होने की इकलौती योग्यता रावण और दुर्योधन से बस थोड़ा सा ज्यादा अहंकार है. यह योग्यता हो तो बात-बात पर बेहूदातम गालियां देना और बिना सोचे-समझे लाठी भांजना इंसान को अपने-आप ही आ जाता है. 

हमारी पुलिसिंग सन 1947 के बाद से ऐसे ही चल रही है. और हाँ, उसके पहले 1858 से भी ऐसे ही चल रही थी. उसके पहले कोई मध्यकालीन इतिहास के जानकार मित्र बताना चाहेंं तो स्वागत है. 

यहाँ हम मानते हैं कि पुलिसिंग हनक से चलती है. हनक नहीं तो पुलिसिंग नहीं. पुलिसिंग का कोई मतलब नहीं. 

यूरोप, अमेरिका और बहुत हद तक आस्ट्रेलिया वाले मानते हैं कि पुलिसिंग में हनक सबसे फालतू चीज़ है. उनके यहाँ पुलिसिंग सिर्फ़ और सिर्फ़ स्मार्टनेस से चलती है. 

हनक और स्मार्टनेस में जो फर्क है, वह आप जानते हैं. बस एक लाइन में समझिए कि हमारे यहाँ अभी तक कायदे का साइबर कानून ही नहीं है. और हाँ, कानून बनाना पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है. अलबत्ता पुलिस को सुधारना हमारे विधिनिर्माताओं की जिम्मेदारी जरूर है.

और विधिनिर्माताओं का आलम यह है कि तकनीक के सहारे समाज योजनों आगे बढ़ गया और हमारे बड़े-बड़े बुद्धिजीवी वैज्ञानिक दृष्टिसंपन्न विधिनिर्माता पीपल के पेड़ पर भूत तलाश रहे हैं.

ख़ैर, फिर भी अगर मैं भविष्य में इसमें कुछ सुधार की उम्मीद करूं तो इसे आप मेरी निरी कल्पनाशीलता तो नहीं मान लेंगे? हो न हो, पर उम्मीद करने में हर्ज ही क्या है!