*एक लघु कथा 'पलायन"*
March 31, 2020 • गुरुकुल वाणी


     

 सिन्हा जी जो टीवी पर न्यूज़ देख रहे थे, चिली चिकन का अंतिम बचा हुआ टुकड़ा भी मुंह मे रखते हुए गुस्से से बोले।

      "व्हाट ए रबिश। ये गरीब लोग सुधरेंगे नहीं। इंडिया मे सब कोरोना से मर रहे हैं। ये लॉकडाउन तोड़ रहे हैं। सब बोरिया बिस्तर लिए मुंह उठाए भाग रहे हैं। पैदल ही चल पड़े हैं यूपी बिहार,स्टुपिट पीपल। क्या समझे हैं वहाँ पहुंच ही जायेंगे। साले वहां पर भी बीमारी फैलाएंगे।" 
      सिन्हा की पत्नी ने सहानुभूति से कहा।"अरे! गरीब मज़दूर हैं यहाँ रुककर भूखे मरेंगे क्या। सो अपने अपने घर निकल रहे हैं सब बेचारे।' 
     "कोई भूखा नही मरेगा। सरकार किसी को मरने नही देगी। मोदी जी और केजरीवाल जी ने वादा किया है। लेकिन हरामखोरों को घर जाने की पड़ी है। पिकनिक पे जा रहे हैं जैसे।" वह और भी अधिक तमतमा गये 
      तभी फोन की घंटी बजी। फोन न्यू यॉर्क, अमेरिका से उनके बेटे का था।
"हेलो पापा'
"हेलो माय सन। हाउ आर यू। एवरीथिंग इस फाइन?"
      "पापा। यहाँ न्यू यॉर्क में कुछ ठीक नहीं हैं। लोग कोरोना से मर रहे हैं। हमारी बिल्डिंग में कई पॉज़िटिव हैं। सरकार ने यहां सब कुछ सील कर दिया। कोई बाहर नही जा सकता। यहां सब डरे हुए हैं पापा।
     प्लीज़ पापा कुछ कीजिए पापा प्लीज़। कल से खाने पीने का सामान खत्म है। हम भूखे हैं पर बाहर जा नही सकते।' वह बताते बताते रो पड़ा। 
      "प्लीज़ पापा अगर आपने कुछ नही किया तो मैं पैदल ही यहाँ से निकल पड़ूंगा। यहां भूखा मरने से बेहतर है कि आप सब के बीच जाकर मरूं। प्लीज़ पापा।'
       सिन्हा जी स्तब्ध थे। शरीर मे काटो तो खून नहीं। रिमोट हाथ से निकल कर नीचे गिर चुका था। चिकन का टुकड़ा गले मे फंस कर रह गया।