....कोरोना-पलायन...बांद्रा स्टेशन, मुंबई
April 15, 2020 • गुरुकुल वाणी

यह तस्वीर मुंबई के पुरबिया मजदूरों की है , आज लॉक डाउन बढ़ने के बाद उनकी भूख ने अपना धैर्य खो दिया, उन्होंने चीख चीख कर कहा कि कोरोना से जाने कब मरेंगे, भूख से अब कतई मर जायेंगे, हमे हमारे गांव जाना है, यह भीड़ रोज रोज  चैनलों पर की जारही उन घोषणाओं की पोल खोलती है जो यह बताती हैं कि भूखों को भोजन मिल रहा है, गरीबो की देखभाल की जा रही है, आख़िर भारत की व्यापारिक राजधानी अपने लिए हाड़ गला कर मेहनत करते मजदूरों के लिए दो वक्त की रोटी नही दे पा रही है, उन मजदूरों की उंगली थामे उनके मासूम बच्चे हैं, उनके बगल में खड़ी उनकी बदहवास बीबी है, यह मंजर देख कर कलेजा मुंह को आता है, वे सब भी इस देश के नागरिक हैं, वे इस देश से हवाई जहाज से विदेश यात्रा की मांग नही करते, वे हवाला में भी शामिल नही होते, वे हर फाइल पर रिश्वत भी नहींलेते , वे पुल, सड़क, बांध में कमीशन खोरी भी नही करते, वे इस देश के ऐसे नागरिक हैं कि वे इस देश से बस काम मांगते हैं, जीतोड़ मेहनत कर इस देश को सजाते हैं कारखाने चलाते हैं, चौकीदारी, सड़क निर्माण, सफाई करते हैं, और अपनी मेहनत की कमाई से दो वक्त की रोटी  फुटपाथ पर ईंट जोड़कर बना लेते हैं, सड़क की नल पर नहा लेते हैं, ये देश को सजाते सम्भालते हैं लेकिन देश से कोई बड़ी उम्मीद नही करते, लेकिन यतनी उम्मीद तो उन्हें करने का हक है ही कि जब उन्हें काम नही मिल रहा तो कुछ दिन उन्हें जीने भर को दो रोटी यह देश उधार में दे वे तो उसे भी चुका देंगे अपनी मेहनत से, वे भिखारी नहीं श्रमिक है उनका भाल उनके स्वाभिमान से दीप्त रहता है वे आश्रित नही वरन इस केंचुआ समाज को अपने श्रम से आश्रय देते हैं, ... आज उनकी इस दशा पर बस यही कहना है कि व्यवस्था तेरी क्षय हो, .... उनपर लाठी बरसाई जा रही, उन्हें लाठी नहीं ,सरकार बहादुर उन्हें रोटी चाहिए,। कोरोना हवाई जहाज से ढोकर लाये धनपशुओं के लिए घर घर डिलवरी कर उनके लिए मक्खन, बटर , हरी सब्जी पहुंचाने वाली  अधम व्यवस्था को सोचना चाहिए कि वे कोरोना नही लाये इस देश मे उन्हें किस जुर्म में लाठी से पीटा जा रहा है, बड़ी बड़ी बातें करने वाली राजनीति कहाँ है, घरों में मृत्यु के भय से दुबके लोग टी वी पर कोरोना का आंकड़ा देख रहे हैं, रेस्टोरेंट का टेस्ट मिले बहुत दिन हुआ, इस पर खीज रहे हैं, कुछ गा रहे हैं कुछ बजा रहे हैं कुछ रामायण में बाल खोज रहे हैं, कुछ किताबें पढ़ रहे हैं, सब अपना समय"इंजॉय" कर रहे हैं ये अमर लोग हैं, ये कभी नही मरेंगे, ये मृत्युंजय लोग हैं, इनके घर मे तीन महीने का राशन, पेस्ट, साबुन, चायपत्ती, सेनेटाइजर है, लूडो है, कैरम है, जबकि श्रमिक भूख से मरने की स्थिति में हैं,

श्रीधर मिश्र