*पूर्वांचल के शेर बाबु बंधु सिंह जी*
July 30, 2020 • गुरुकुल वाणी

*अरविन्द पाण्डेय द्वारा*

सलेमपुर देवरिया। बाबू बंधू सिंह पर कभी एक पूरा स्वतंत्र लेख लिखें. तरकुलहा माई का माहात्म्य  उसमें हर हाल में आएगा ही, लेकिन बंधू सिंह की अपनी जीवनी भी कम रोचक नहीं है. "
पूर्वी उत्तर प्रदेश खासकर गोरखपुर का 1857 की क्रांति में अहम रोल रहा है। इस क्रान्ति के गरम दल के क्रांतिकारियों में चौरीचौरा के डुमरी बाबू गांव निवासी का अंग्रेजों में बेहद खौफ था। अंग्रेजों ने अलीनगर स्थित एक पेड़ पर फांसी देने का 6 बार प्रयास किया लेकिन हर बार फांसी का फंदा टूट जाता था। 7वीं बार मां जगदजननी का ध्यान कर फांसी के फंदे को चूमते हुए उन्होंने कहा, ''हे मां अब मुझे मुक्ति दो।''

पेड़ से निकली थी रक्त की धारा...

- एक तरफ अलीनगर स्थित इस पेड़ पर 12 अगस्त 1857 को क्रांतिकारी बंधू सिंह को फांसी के फंदे पर लटकाया गया। उसी वक्त यहां से 25 किमी दूर देवीपुर के जंगल में उनके द्वारा स्थापित मां की पिंडी के बगल में खड़ा तरकुल का पेड़ का सिरा टूटकर जमींन पर गिर गया।

- इस टूटे तरकुल के पेड़ से रक्त की धारा निकल पड़ी। यहीं से इस देवी का नाम माता तरकुलहा के नाम से प्रसिद्द हो गया। मंदिर में भक्तों द्वारा सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है।

- यहां वैसे तो हमेशा श्रद्धालुओं का आना रहता है लेकिन चैत्र नवरात्र में यहां एक माह तक मेला चलता है।

बंधू सिंह ने स्थापित की थी मां की पिंडी

- स्थानीय निवासी राजेश कुमार जायसवाल ने कहा, ''बात 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से पहले की है। इस इलाके में जंगल हुआ करता था। यहां पास से गोर्रा नदी बहती थी। जो अब नाले में तब्दील हो चली है।''

- ''यहीं समीप ही डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। उन्होंने अंग्रेजों को देश से भगा देने के लिए ठान ली थी। अंग्रेजों को सबक सिखाने के लिए गोर्रा नदी के जंगलों में बाबू बंधू सिंह रहा करते थे।''

- ''नदी के तट पर तरकुल (ताड़) के पेड़ के नीचे पिंडियां स्थापित कर वह देवी की उपासना किया करते थे। देवीपुर की यह देवी बाबू बंधू सिंह की इष्ट देवी थी। जो उनके शहीद होने के बाद तरकुलहा देवी के नाम से प्रसिद्द है।''
 
अंग्रेज सैनिकों की गर्दन धड़ से अलग कर सिर चढ़ा देते थे मां को

- शहीद बंधू सिंह के परिजन बीजेपी नेता अजय सिंह ने कहा, ''जब बंधू सिंह बड़े हुए तो उनके दिल में भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आग जलने लगी। ऐसा उनके पूर्वजों ने बताया कि बंधू सिंह गुरिल्ला लड़ाई में माहिर थे, इसलिए जब भी कोई अंग्रेज उस जंगल से गुजरता, बंधू सिंह उसकी गर्दन धड़ से अलग कर सिर मां शक्ति स्वरूपा पिंडी पर चढ़ा देते।''

- ''जब कई सैनिक जंगल में जाकर नहीं लौटे तो अंग्रेज यहां समझते रहे कि सिपाही जंगल में जाकर लापता हो जा रहे हैं।''

- इतिहासकार डॉ. दानपाल सिंह ने कहा, ''पहले तो अंग्रेज अफसर यह समझते रहे कि सैनिक जंगलों में जंगली जानवरों का शिकार हो रहे हैं। बाद में धीरे-धीरे उन्हें भी पता लग गया कि अंग्रेज सिपाही बंधू सिंह के हाथों बलि चढ़ाएं जा रहे हैं।''

- ''अंग्रेजों ने बंधू सिंह की तलाश में जंगल में एक बड़ा तलाशी अभियान चला दिया। बहुत तलाश के बाद भी बंधू सिंह उनके हाथ नहीं आए। उस समय भी गद्दारों की कोई कमी नहीं थी।''

- ''बंधू सिंह को सरदार मजीठिया की मुखबिरी के चलते अंग्रेजों ने पकड़ लिया। कोर्ट में उन्हें पेश किया गया फिर गोरखपुर के अलीनगर चौराहे पर सरेआम उन्हें फांसी दी गई।''

-मंदिर के पुजारी दिलीप त्रिपाठी ने कहा, ''बंधू को उधर फांसी का फंदा लगा और इधर तरकुल का पेड़ का सिरा टूट गया और खून की धारा काफी देर तक बहती रही।''