*रणबाकुरों की कुर्बानी नही भूलेगा हिदुस्तान*
July 26, 2020 • गुरुकुल वाणी


बर्फीले पहाड़ियों की चोटियों पर घात लगाए बैठे शत्रुओं को दी मात

(कारगिल विजय दिवस पर विशेष)

*सांकृत्यायन रवीश पाण्डेय द्वारा*
सलेमपुर,देवरिया। कारगिल में बर्फीले पहाड़ की चोटियां। शत्रु घात लगाए बैठा था। लगभग 1800 फुट ऊपर पहाड़ियों में छिपा दुश्मन भारतीय जांबाजों को रोकने की हर संभव कोशिश कर रहा था। लेकिन हमारे जांबाज प्राणों की परवाह किए बिना बढ़ते रहे। अपनी बहादुरी का परचम दिखाते हुए दुश्मानों को पीठ दिखाकर भागने पर मजबूर कर दिया। कारगिल पर फतह हासिल कर दुनिया को संदेश दिया कि हमसे टकराने वाले मिट्टी में मिल जाएंगे। वर्ष 1999 के उस रण में राजधानी के कई जांबाज शहीद हुए। उन्होंने देश की रक्षा में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। 

सिर में लगी गोली भी कैप्टन मनोज पाण्डेय को न डिगा सकी
कारगिल की जब्बार पहाड़ी पर कब्जा, बटालिक सेक्टर से घुसपैठियों को खदेड़ने व कई अन्य आपरेशन को सफलता पूर्वक अंजाम पहुंचाने के बाद कैप्टन मनोज पाण्डेय को खालुबार पर विजय हासिल करने की जिम्मेदारी दी गई। वर्ष 1999 में 2/3 जुलाई की रात धावा बोलकर दुश्मनों के दो ठिकानों को ध्वस्त कर दिया। तीसरे ठिकाने को नष्ट करते समय उनका कंधा व पैर जख्मी हो गया। जख्मों की परवाह किए बिना अपने साथियों के साथ उन्होंने चौथे ठिकाने पर धावा बोल दिया। तभी दुश्मनों की एक गोली उनके सिर को भेदते हुए पार निकल गई। इसके बावजूद उन्होंने अनन्य साहस दिखाते हुए ग्रेनेड से हमला कर चौथा ठिकाना भी नष्ट कर दिया और खालुबार पर कब्जा कर लिया। इस पराक्रम में बुरी तरह घायल हो गए और 3 जुलाई को ही वह वीरगति को प्राप्त हो गए। 

कैप्टन आदित्य मिश्र ने दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए।
सिग्नल आफीसर होने के बावजूद कैप्टन आदित्य मिश्र ने न सिर्फ दुश्मनों को दांत खट्टे किए बल्कि बटालिक सेक्टर के एक पोस्ट से घुसपैठियों को मार भगाया। जून 1996 में भारतीय सेना के सिग्नल कोर में कमीशन मिलने के बाद पहली पोस्टिंग अमृतसर में हुई। अक्टूबर-1998 में वह लेह में आफीसर कमांडिंग के रूप में तैनात हुए। आपरेशन विजय के दौरान वह बटालिक सेक्टर में सिग्नल आफीसर की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उनको एक पोस्ट पर घुसपैठियों के मौजूदगी की जानकारी मिली। उन्होंने आपनी जान की परवाह किए बिना दुश्मनों से मोर्चा ले लिया और घुसपैठियों को भागने पर मजबूर कर दिया। इसी दौरान दुश्मन की गोली उनके सीने में लगी और 25 जून 1999 को वह वीरगति को प्राप्त हो गए।