,,, ,  शोषित समाज के प्रवर्तक,,
June 10, 2020 • गुरुकुल वाणी


         ,,,,,,संत कबीर दास,,,,, ,
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संत कबीरदास का जन्म स्थान वाराणसी शहर में जेठ पूर्णिमा संवत 1455 बताई (सन् 1398) गई थी ।संत कबीर के जन्म के संबंध में अनेकों भ्रांतियाँ है ।बनारस गजेटियर में कहा गया है कि संत कबीरदास का जन्म बनारस में न होकर उसके आसपास भी नहीं परंतु आजमगढ़ जिले मोहल्ला वेलहर में हुआ था ।इसका प्रमाण आज भी वहां के पटवारी के कागजों में बेलहर पोखर के रूप में लिखा मिलता है ।
संत कबीरदास के संबंध में कई किवदंतियां पाई जाती है नाभादास की रचना भक्तमाला में जो सन् 1585 में लिखी गई थी कबीर के दृष्टिकोण का तत्कालीन सामाजिक समस्याओं के संबंध में स्पष्ट उल्लेख है ।अबुल फजल लिखित, आइन, ए, अकबरी में जो अकबर महान के 42वें वर्ष में सुना 1598 में लिखी गई थी, कबीर के बारे में दो स्थानों पर जिक्र मिलता है ।इनमें कबीर को मुवाहिद, अर्थात अद्वैतवादी कहा गया है ।इनकी दो मजारें एक जगन्नाथपुरी तथा दूसरी रतनपुर (अवध)(साकेत)में भी बताई गई है ।
कश्मीर के मोहसिन कानी द्वारा 17वीं सदी के उत्तरार्द्ध में लिखित फारसी इतिहास, दविस्ता में कबीर के संबंध में कई बातें लिखी मिलती है, जो अन्य वर्णित घटनाओं से मिलती, जुलती है।उनमें लिखा है कि कबीर जाति से जुलाहे थे ।अपने अध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ाने के लिए कबीर हिंन्दू साधुओं तथा मुसलमानों में पीर फकीरों दोनों के पास गए, परन्तु उनको दोनों में से किसी के पास भी ज्ञान नहीं मिला ।ऐसा भी माना जाता है कि ये बादशाह सिकंदर लोदी के समकालीन ही थे ।इस प्रकार का भी संदर्भ मिलता है कि कबीरदास स्वतंत्र विचारों के अर्थात निर्गुणवादी थे ।इसलिए सिकंदर लोदी को ये बातें अच्छी नहीं लगती थी ।जिससे कबीर को यातनाएं भी दी गई ।कबीरदास की मृत्यु के बारे में बहुत मतभेद है, परन्तु फिर भी अधिक मान्यताओं के आधार पर उनकी मृत्यु सन् 1575में हुई थी ।संत कबीरदास एक दिन भी स्कूल नहीं गए थे, क्योंकि उस समय शिक्षा के दरवाजे सभी अछूतों के लिए खुले नहीं थे।उनके इस कथन से पुष्टि हो जाती है ।
   ,मसि  कागद छुओ नहीं ।
     ,कलम गहयो नहीं  हाथ ।
इस प्रकार कबीर ने जो भी ज्ञान अर्जित किया वह पीर, व, फकीरों की संगति में बैठकर ही किया था ।दूसरे स्थान पर कबीर कहते हैं कि तुम तो कागज पर लिखने के आधार पर बात करते हो,परंतु मैं तो आंखों देखी बात करता हूँ ।
कबीरदास जी समझते थे कि हिंन्दू और मुसलमानों के आपसी झगड़ो का मुख्य कारण अंधविश्वास और बाह्राडंबर का होना है उन्होंने कहा राम और रहीम दोनों एक ही हैं ।फिर दोनों क्यों लड़ते हैं, हिंदुओं के साधु नंगे रहते थे, तो इस संबंध में उनके विचार थे कि अगर नंगे रहने से स्वर्ग मिलता है,तो हिरन वनों में नंगे रहते हैं ।अगर गंगा स्नान करने से स्वर्ग मिलता है तो मछलियां गंगा में ही रहती हैं ।मछलियां का तो जीवन व मरण जल में ही होता है ।अगर दाढ़ी व जटा बढ़ाने से कोई स्वर्ग में जाता है, तो बकरा दाढ़ी व जटा रखता है, तो वह स्वर्ग में क्यों नहीं जाता है ।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि ।
     ,कांकर पाथर जोड़ी के मस्जिद लेई चुनाय ।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय ।
,,जप तप पूजा अरचा जोगि जग बौराना ।
कागद लिखी जगत भुलाना मन ही मन न समाना ।।
पाहन केरी पूतरी करी पूजा करतार ।
वाहि भरोसे मत रहो बूड़ा काली घार ।।
            साभार    डी, पी,बौद्ध