आयुर्वेद की प्राण हैं वनस्पतियां : डा० गणेश
March 20, 2020 • गुरुकुल वाणी

वनस्पतियां आयुर्वेद की प्राण होती हैं। कारण की वनस्पतियों में अधिकांश वनस्पतियां ऐसी होती हैं, जो औषधीय गुणों की खान होती हैं। यही कारण है कि ऐसी वनौषधियों को आयुर्वेद का प्राण कहा जाता है। बहुत सी वनौषधियों जैसे- नीम, बेल, आंवला, आम, अर्जुन, महुआ, हरश्रृंगार, बबुल आदि के औषधीय गुणों से तो परिचित हैं, किन्तु अभी भी सैकड़ों पेड़ पौधे ऐसे हैं जौ औषधीय गुणों से भरपूर हैं, जिनके बारे में हम अभी तक नहीं जानते हैं।

नीम एक ऐसा वृक्ष है जिसकी जड़, छाल, टहनी, पत्तियाँ, फूल एवं फल सभी किसी न किसी रोग में औषधि के काम आते हैं। इस पेड़ का प्रत्येक अवयव रोग प्रतिरोधक क्षमता रखता है एवं अति उत्तम कोटि का एन्टीबायोटिक है। बेल के गुणों को कौन नहीं जानता है। इसे अमृतफल भी कहा जाता है। इसकी पत्तियां एवं फल पेट संबंधी रोगों में रामबाण औषधि का काम करता है। अर्जुन हृदय रोग सहित स्त्रियों में होने वाले श्वेत प्रदर एवं पेशाब में जलन में उपयोगी होता है। अडूसा का पौधा खांसी एवं कफ रोग में अति उपयोगी होता है। ब्राह्मी का पौधा मस्तिष्क ,उन्माद एवं अपस्मार रोग में विशेष लाभ फहुंचाता है। आयुर्वेद मे पलास के 38 उपयोग बताए गये है जो प्रमेह, कुष्ठ, शोध, हृदय रोग, अर्श, ग्रहणी अतिसार एवं कास रोगों में लाभ पहुंचाता है। सहजन एक अमूल्य औषधीय वृक्ष है जिसके सभी अयवय औषधीय गुणों से ओत-प्रोत हैं। यह उदर एवं वात रोग, नेत्ररोग, दुर्बलता, कफवात आदि रोगों में विशेष उपयोगी है।

आम के वृक्ष से तो हम सभी परिचित ही हैं। इसके सभी अवयव इतने उपयोगी हैं कि य कहावत प्रलचित हो गया है कि "आम के आम, गुठलियों के दाम"। आम को फलों का राजा कहा जाता है।  यह पौष्टिक होने के साथ ही साथ कंठ दोष, अमाशय, मसूढ़ों मे रक्तस्राव, प्रवाहिका, दुर्बलता, कृमिघ्न, श्वसन, अतिसार, दाह एवं लू के उपचार मे विशेष उपयोगी होता है। शहतूत एक विशेष उपयोगी वृक्ष है जो रक्तपित्त, कृमिरोग, मुखगत व्रण, पित्त आदि में उपयोगी होता है। शमी का वृक्ष धार्मिक महत्व के साथ साथ औषधीय गुणों से भी युक्त होता है। इसका उपयोग रक्तपित्त, अतिसार, अर्श, श्वांसरोग, खांसी, भ्रम, कृमिरोग आदि का नाश करता है।

वनौषधियों में त्रिफला का विशेष महत्व है, जिसमें आंवला, हरण एवं बहेड़ा तीन  वृक्ष आते हैं। आंवला को कलियुग का अमृत फल माना गया है, जो शरीर के प्रत्येक अवयव के लिए उपयोगी होता है। पेट के समस्त रोगों, आंख की रोशनी , दंत क्षय, बालों के झड़ने एवं पकने में त्रिफला का प्रयोग अति उपयोगी होता है। त्रिफला का सेवन पूरे जीवन भर किया जा सकता है। इसके नियमित प्रयोग से काया कंचन हो जाती है और जल्द बुढ़ापा भी नहीं आता है।

उपर्युक्त वनस्पतियों के अतिरिक्त सैकड़ों ऐसी वनस्पतियां हैं, जो औषधीय गुणों से भरपूर हैं। इनमें अनेक तरह के फल एवं फूल, छोटे बड़े वृक्ष एवं लताएं भी हैं, जिनमे से गुंजा, खदिर, शिकाकाई, बबूल, चिरचिरा, वच, गोरख इमली, हंसपदी, कंटाला, घोड़ करंज, सिरिस, प्याज, लहसुन, घृतकुमारी, कुलिंजन, सतवन, गुलखैरो, चौलाई, लिली, इलायची, सुरन कंद, काजू बदाम, अन्नानास, कालमेघ,सीताफल, कदम्ब, अजवाइन, सुपारी, सत्यानाशी, घावपत्ता, रूद्रजटा, कटहल, रक्तपुष्पी, सफेद मुशली, शतावर, तालमखाना, जलब्राम्ही, बांस, कचनार, पुनर्नवा, सरसो, राजिका, पत्थरचूर, पलाश, कंट करंज, मंदार, भांग, मिरचा, पपीता, खासा, कुल्थी, सनाय, अमलतास, चकवड़, सदाबहार, देवदार, रातरानी, बथुआ, कपूर, तेजपात, दालचीनी, लघुपाठा, हड़जोड़, नींबू, पीला हुर हुर, अपराजिता, कुनदरू, गूग्गूल, शंखपुष्पी, लिसोढ़ा, धनिया, जमालगोटा, जीरा, आमा हल्दी, अमरबेल, चाय, हरीदूब , शीशम, धतूरा, गाजर, सरिवन, भृंगराज, सेंहुड़, मखाना, बरगद, अंजीर, गूलर, पीपल, गोंद, मुलैठी, गम्हाय, कपास, फालसा, सिल्वर आक, गुणमार, हुर हुर, गुड़हल, कुटज, चमेली, एरण्ड, वन तुलसी, गूमा, अलसी, लिची, पुदीना, छुई मुई, मौलसिरी, सहतूत, कामिनी, जायफल, कमल, कनेर, हरसिंगार, केवड़ा, पोस्ता, भुईं आमला, नागरबेल, पीपर, अशोक, बादाम, अनार, सेव, गुलाब, सेमल, रीठा, साल, चिरायता, इमली, झाऊ, निर्गुण्डी, अश्वगंधा एवं बेर आदि ऐसे औषधीय वृक्ष, लताएं, फल, एवं फूल है जो विशेष उपयोगी हैं। आवश्यकता है इनको पहचानने एवं उपयोग में लाने की।