असमानता के खिलाफ जंग था बाबा साहब का जीवन : संतोष कुशवाहा
April 14, 2020 • गुरुकुल वाणी

मानवता के मसीहा बाबा साहब डॉ0 भीमराव अंबेडकर ने घनघोर अंधेरे में उजियारा फैलाया इस तरह से जुबान दी जीवनदान दिया कि मुर्दे भी मसीहा बन गए छिपी हुई बेशुमार शक्तियों से आज भी संपूर्ण संसार अचंभे में है कि आपने किस तरह नश्ल रंग, ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाया इंसानी किश्ती के खिवैया तूने दुनिया में यह साबित कर दिया की कोई शूरवीर जमाने के चेहरे पर किस तरह अपनी छाप लगा जाते हैं ऐ भीम अब तो संसार की कोई भी करवट आप के किले को नहीं ढहा सकती और ना ही तूफान या अँधियारा आपके द्वारा जलाए गए चिरागों को बुझा सकती है।

आपके मार्गदर्शन से ही पिछले 70 वर्षों में ही मनुष्य की जीवन शैली, सोच-विचार धारणाओं, टेक्नोलॉजी जीवन को इसके उद्देश्य के प्रति मान्यताओं में जितना तेजी से बदलाव आया है उतना बीते 2000 वर्षों में नहीं आया था।

मानव जीवन में धन का महत्व इसे कमाने के ढंग तथा धन को खर्च प्रदान करने का सही व्यवहारिक मानव कल्याण का रास्ता भगवान बुध्द, संत कबीर, बाबा साहब अंबेडकर ने बताया है। तथागत बुद्ध ने गरीबी का कभी गुणगान नहीं किया बल्कि कहा कि गरीबी सबसे बड़ा रोग है। यह सारे दुखों की जननी है। उन्होंने भूख गरीबी दरिद्रता का अभाव के जीवन से मुक्ति का मार्ग बताया, उन्होंने मेहनत ईमानदारी व न्याय संगत धन से धन को कमाने तथा इसे घर, परिवार, व्यापार व मानव कल्याण में खर्च करने तथा दान करने को कहा। बुद्ध ने यह भी कहा कि मनुष्य धनी बने लेकिन धन के गुलाम नहीं बने।  आरोग्य सबसे बड़ा सुख तथा लालच से परे संतोष सबसे बड़ा धन है। मानवता के मसीहा व विख्यात अर्थशास्त्री डॉ भीमराव अंबेडकर ने तो मानो पिछड़े, अति पिछड़े दलित, शोषित, वंचित समाज की अंततः आर्थिक समृद्धि के लिए ही अपने जीवन को मशाल बना दिया। वंचित वर्ग की गरीबी की वजह से वे काफी चिंतित रहते थे तथा इससे हर हाल में मुक्त दिला कर दलितों को धनी बनाना चाहते थे, उन्होंने खुद ने गरीबी और अभाव की असहनीय पीड़ा को भोगा था इसलिए अपने जीवनकाल का उद्देश्य ही समाज का सामाजिक आर्थिक व राजनीतिक उत्थान करना चाहते थे कि दलित धनवान बने, सिर्फ नौकरी मांगने वाले ही नहीं बल्कि नौकरी देने वाले भी बने, इसलिए उन्होंने एक ओर सत्ता से संघर्ष किया तो दूसरी ओर कहा कि पिछड़े, अति पिछड़े, शोषित, वंचित व दलित वर्ग मंदिर, धर्मशाला, पूजा-पाठ, कर्मकांड तीर्थ यात्रा आज से दूर रहें तथा अपने आर्थिक, सामाजिक सुधार हेतु उच्च शिक्षा ग्रहण करें। धनी बनाने वाले रोजगार,  व्यवसाय अपनाएं।  उन्होंने चेताया था कि विषमता की खाई को जल्दी खत्म नहीं किया गया तो इससे पीड़ित लोग लोकतंत्र के महल को भस्म कर देंगे। आजादी के इतने लंबे समय बाद भी आर्थिक गैर बराबरी दिनों दिन बढ़ती जा रही है। आज दलित, पिछड़े, आदिवासी व शोषित वर्ग के सामने रोजी-रोटी का अभाव पैदा हो गया है, खेती-बाड़ी है नहीं, रोजगार व व्यापार अपनाये। सरकारी नौकरियों में आरक्षण रूपी हथियार को पिछड़े, अति पिछड़े, दलित, शोषित व वंचित समाज को विरोधियों ने एक साजिश के तहत पहले दरवाजे से खत्म कर दिया है। देश में एक वर्ग हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है वहीं पिछड़े, दलित, शोषित, वंचित व अल्पसंख्यक वर्ग के सामने भारी संकट पैदा हो गया है, ऐसे समय में छोटा बड़ा व्यापार किया जाना बहुत जरूरी है, सिर्फ आरक्षण के नाम पर अब तक मात्र की गई नौकरियों के लिए रात दिन एक करना आरक्षण को बचाने के लिए ही सारी ताकत झोंक देना ठीक नहीं है। हमें अब गांव कस्बे शहर विदेश में हर तरह के उद्यम, बिजनेस, व्यापार, सप्लाई, ठेका, एनजीओ, मीडिया तथा विशाल प्राइवेट क्षेत्र में प्रवेश करना होगा सरकारी नौकरों में 1% व निजी क्षेत्र में रोजगार है, हर क्षेत्र में टेक्नोलॉजी का तेजी से विकास हो रहा है बिजनेस दुकान शोरूम से भी आगे ऑनलाइन हो चुका है। पूरी दुनिया एक छोटा सा गांव बन चुकी है, तेजी से बदल रहा वातावरण हमारी जातियों के बंधन ढीले पड़ रहे हैं मानो जीवन में धन का महत्व इसे कमाने के धन तथा धन को हर्षवर्धन करने का सही व्यवहारिक मानो कल्याण का रास्ता भगवान बुद्ध संत कबीर बाबा साहब अंबेडकर ने बताया है तथागत बुद्ध गरीबी का कभी गुणगान नहीं किया बल्कि कहा गरीबी सबसे बड़ा रोग है सारे दुखों की जननी है। उन्होंने भूख, गरीबी, दलित स्वभाव के जीवन से मुक्त का मार्ग बताया उन्होंने मेहनत, इमानदारी ना संगठन से धन को कमाने तथा इसे घर परिवार, व्यापार व मानव कल्याण में खर्च करने तथा दान करने को कहा, बुद्ध ने यह भी कहा मनुष्य धनी बने लेकिन धन के गुलाम नहीं। आरोग्य सबसे बड़ा सुख तथा लालच से परे संतोष सबसे बड़ा धन है। मानवता के मसीहा व विख्यात अर्थशास्त्री डॉ भीमराव अंबेडकर ने तो मानो पिछड़े,  दलितों, शोषितों, अल्पसंख्यकों की अंततः आर्थिक समृद्धि के लिए अपने जीवन को मशाल बना कर जिया। वंचित वर्ग की गरीबी व  दरिद्रता से चिंतित रहते थे तथा इसे हर हाल में मुक्त दिलाकर पिछड़ों अति पिछड़ों शोषित वंचितों, अल्पसंख्यकों व दलितों को धनी बनाना चाहते थे। उन्होंने खुद गरीबी व अभावों की असहनीय पीड़ा को भोगा था इसलिए अपने जीवन काल का उद्देश्य ही इस वर्ग का सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक उत्थान करना चाहते थे।

वह चाहते थे कि  पिछड़े, अति पिछड़े, शोषित, वंचित, अल्पसंख्यक व दलित धनवान बने सिर्फ नौकरी मांगने वाले ही नहीं बल्कि नौकरी देने वाले भी बने। इसलिए बाबा साहब एक और सत्ता से संघर्ष किये तो दूसरी और कहा कि दलित वर्ग मंदिर, धर्मशाला, पूजा-पाठ, कर्मकांड, तीर्थ यात्रा, दर्शन आदि से दूर रहें तथा अपने आर्थिक उद्धार हेतु उच्च शिक्षा ग्रहण करें, धनी बनाने वाले रोजगार, व्यवसाय अपनाएं।

उन्होंने आगाह किया था कि विषमता की खाई को जल्दी खत्म नहीं किया गया तो इससे पीड़ित लोग लोकतंत्र के महल को भस्म कर देंगे। आजादी के इतने लंबे समय के बाद भी आर्थिक गैर बराबरी दिनों दिन बढ़ती जा रही है।

आज पिछड़े,अति, पिछड़े, शोषित, वंचित, अल्पसंख्यको, दलितों व आदिवासियों के सामने रोजी रोटी का भारी संकट पैदा हो गया है। न खेती-बाड़ी, न रोजगार, न व्यापार, न शिक्षा। सरकारी नौकरियों में आरक्षण रूपी हथियार को दलित विरोधियों ने एक साजिश के तहत पिछले दरवाजे से खत्म कर दिया है देश में एक वर्ग हर क्षेत्र में दिनोंदिन आगे बढ़ रहा है वही दलितों व शोषितों के सामने भारी संकट पैदा हो गया है। ऐसे समय में छोटा बड़ा व्यापार किया जाना बहुत जरूरी है सिर्फ आरक्षण के नाम पर अब नाम मात्र की नौकरियों के लिए रात दिन एक करना व आक्षण को बचाने के लिए ही सारी ताकत झोंक देना ठीक नहीं है। हमें गांव कस्बे शहर व विदेश में हर तरह के उद्यम, बिजनेस, उत्पादन, सप्लाई, ठेका, एनजीओ, मीडिया तथा विशाल प्राइवेट क्षेत्र में प्रवेश करना ही होगा। हमें बनिए को गाली नहीं देनी है बल्कि उससे बिजनेस के गुण सीखने हैं।

दलित, पिछड़े, अति पिछड़े, शोषित, वंचित व अल्पसंख्यक वर्ग हमेशा से ही मेहनत, कर्मठ, वफादार, प्रतिभाशाली व हुनरमंद रहा है देश दुनिया के इस दौर में हम समय के साथ नहीं दौड़े तो बहुत पीछे रह जाएंगे, व्यापार में कई पीढ़ियों का उद्धार हो जाता हैं, लेकिन सरकारी नौकरी में नहीं, अब नौकर मालिक नहीं बनता है। सेठ व अफसर के नहीं बल्कि खुद के सपने साकार करने का प्रण लेना है। ज्ञान व अंधविश्वास से भगवान बुद्ध, संत कबीर, बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी की शिक्षाएं हमारे सामाजिक आर्थिक मुक्ति का मार्ग हैं। हमें मेहनत ईमानदारी व न्याय संगत ढंग से धन कमाकर धनवान बनना है।

मेरे भारत के मूलनिवासी बंधुओ अब बिजनेस नहीं करने का बहाना नहीं चलेगा, हिंदू धर्म शास्त्रों में हमारे खिलाफ क्या-क्या लिखा है इसकी चीर फाड़ में अब समय बर्बाद नहीं करना है। सवरणो, ब्राह्मणों और बनियों को सिर्फ कोसने से कुछ नहीं मिलेगा, बीपीएल, सब्सिडी, नरेगा की मजदूरी राशन की सस्ती चीनी, आटा,चावल की चाह में कब तक हम गांव में अपनी जिंदगियां बर्बाद करते रहेंगे। कई कौमें आजादी के बाद बिजनेस के सहारे इतनी आगे बढ़ चुकी हैं 70 साल पहले इस देश में शरणार्थी थे लेकिन आज आथिर्क सत्ता के सिंहासन पर विराजमान हैं। अब पूजी पतियों को गाली देने से हमारा उद्धार नहीं होगा नेक ढंग से बिजनेस कर हमें भी पूजीपति बनना है, धन की कमी से पिछड़े, अति पिछड़े, दलित, शोषित, वंचित, अल्पसंख्यक व आदिवासी वर्ग ने बहुत दुख झेले हैं। कब तक हमारे लोग फटे चीथड़ों, टूटी फूटी झोपड़ियों में रहेंगे और बिना दवा तड़पते रहेंगे।आखिर कब तक गरीब लोग अपनी गरीबी व दरिद्रता के छुटकारे के लिए मंदिरों में नाक रगड़ने जाते हुए भगदणो में बेमौत मारे जाएंगे और कब तक अच्छे कपड़े, भरपेट भोजन व रोजगार के लिए दूसरों के आगे झोली फैलाते रहेंगे।

हकीकत यह है कि दलित, पिछड़ा अति पिछड़ा, शोषित, वंचित, अल्पसंख्यक व आदिवासी इस व्यापार तंत्र में सिर्फ ग्राहक बना हुआ है जो  केवल कमाता ही उच्च जातियों के इस बाजार के लिए है। सड़क खेत कारखाने व मकान का काम करने वाले मजदूर से लेकर दलित कर्मचारी अधिकारी चाहे कितना ही सरकारी नौकरी से कमाए उसका बहुत बड़ा भाग  वणिक वर्ग द्वारा संचालित बाजार में ही खर्च करता है। जन्म से मृत्यु तक एक आम आदमी अपनी गाढ़ी कमाई का अधिकांश भाग रीत रिवाज व धार्मिक कर्मकांड में खर्च कर देता है। इसका सारा पैसा ब्राह्मण या वणिक वर्ग के जेब में जाता है आज दिनोंदिन विकसित हो रही बाजार में हम कहीं नहीं हैं सिर्फ एक जगह हम नजर आते हैं चकाचौंध भरे बाजार में कहीं-कहीं पर पेड़ के नीचे जूता काटता हुआ मोच्ची नजर आता है हम सभी दलित समाज के प्रतिनिधि बनकर बाजार तंत्र का हिस्सा बने हुए है वरना संपूर्ण दलित समाज एक असहाय ग्राहक से ज्यादा कुछ नहीं है।

अतः आज बाबा साहब के जन्म दिवस पर हम पिछड़े, अति पिछड़े, दलित, शोषित, वंचित, अल्पसंख्यक व आदिवासी समाज के लोग आज रात 8:00 बजे एक दीपक जलाकर यह प्रण लें कि आज के बाद हम उच्च शिक्षा व्यापार में भागीदारी लेने के लिए कृतसंकल्प हैं और जी तोड़ मेहनत करेंगे और उच्च शिक्षा, सत्ता व संपत्ति के लिए सदैव संघर्षरत रहेंगे।
         साभार- डॉ राजेंद्र सिंह बौद्ध 
लखनऊ, मोबाइल नंबर 94 157 60603