बाबूजी की कविता : डाॅ. राजेश कुमार
June 24, 2020 • गुरुकुल वाणी

बदल गया है गांव हमारा,अब पहले जैसी बात कहां ?
कउड़े पर सुनते थे किस्सा, अब वो ठंडी रात कहां?
अबाबील घर से गायब है, गौरैया भी रूठ गई।
आंगन में बरसे मछली, अब पहले से बरसात कहां?
गीत-गवनई गारी-सोहर, आल्हा-बिरहा भूल चुके।
 डोली में दुल्हन का रोना, अब वैसी बरसात कहां?
भुजा, भेली और बताशा, खाजा घर-घर में बटता था।
 कहां बटे अब लड्डू पेड़ा, मन भाती सौगात कहां?
 गाही बाबा, भुल्लर चाचा, मुंशी जी अब नहीं रहे,
 दुख में सब के आंसू पोछे, सब में वह औकात कहां?
 खत लिखने पढ़ने वाले भी, सुख दुख में साथी होते।
मोबाइल मैं अब बात होती, दिल में वह जज्बात कहां?

लेखक-
Late Mr. Santraj
आभार Dr.Rajesh KumarDr Sandeep Kumar Dr.Chitrasen Gautam
बेमतलब सी इस दुनिया मे वो ही हमारी शान है,
किसी शख़्स के वजूद की पिता ही पहली पहचान है
  बाबूजी की सुनहरी यादों को समर्पित।