भारतीय न्यायतंत्र का नायाब फैसला
April 24, 2020 • गुरुकुल वाणी


नालन्दा,  बिहार बच्चे ने चोरी की। पुलिस ने पकड़ लिया। नाबालिग चोर को न्यायालय में पेश किया गया। जज मानवेंद्र मिश्र को पता चला कि बच्चे ने भूख से तड़प रही मां के लिए खाना जुटाने के लिए चोरी की थी।

बच्चे के बाप की मौत हो चुकी है। माँ मानसिक विक्षिप्त है। एक और छोटा भाई है। यह नाबालिग मजदूरी करता है। लॉकडाउन में काम बंद हो गया। मजदूर बच्चा मां और भाई को खिलाने के चोरी करने को मजबूर हुआ। यह परिवार एक झोपड़ीनुमा घर में रहता है जिसे आप झोपड़ी भी नहीं कह सकते। छत के नाम पर सड़ा हुआ फूस है। उनके पास सोने के लिए चारपाई तक नहीं है। उनके सामने खाने-पीने का संकट है।

जज ने आरोपी को सजा देने के बजाय उसे राशन और अन्य चींजें मुहैया कराने का आदेश दिया। उसकी विक्षिप्त मां लिए कपड़े दिलाए। अधिकारियों को आदेश दिया कि उसे हर संभव मदद और सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ दिया जाए। अदालत ने हर 4 महीने में किशोर से जुड़ी प्रगति रिपोर्ट सौंपने के निर्देश पुलिस को दिए। इसके अलावा जज ने बीडीओ को परिवार को राशन कार्ड, सभी सदस्यों के आधार कार्ड, किशोर की मां को विधवा पेंशन, गृह निर्माण के लिए अनुदान राशि समेत सभी जरूरी दस्तावेज तैयार कराने के लिए कहा है।

मामला बिहार के नालंदा जिले का है। यह फैसला मानवता और न्याय की मिसाल है। जज को यह समझना होता है कि कोई अपराधी है तो क्यों है। उसकी तह में गए बिना आप न्याय नहीं कर सकते। हो सकता है कि साधन संपन्न होकर वह बच्चा बेहद योग्य और प्रतिभाशाली होता, लेकिन भूख ने चोरी करने को मजबूर किया। 

इस कोरोना ने हमारी एक ऐसी कमजोरी को उभारा है जिसे सालों से दबाने का प्रयास किया जा रहा था। करोड़ों की संख्या में ऐसे लोग हैं, जिनकी एकमात्र समस्या है पेट भरना।

साभार  कृष्ण कान्त