भारतीय संस्कृति अरण्य संस्कृति रही है, इसे पुनर्जीवित करना होगा : डा० गणेश पाठक
March 21, 2020 • गुरुकुल वाणी

भारतीय संस्कृति में वन एवं वन्यजीव  संरक्षण की अवधारणा कूट-कूट कर भरी पड़ी है। कारण कि हमारी संस्कृति ही अरण्य संस्कृति (वन संस्कृति) रही है, जहां वृक्षों एवं वनस्पतियों को दवता मानकर पूजा का विधान बनाया गया है। वृक्षों एवं वनस्पतियों को कोई हानि न पहुंचाए, इसके लिए उन पर देवी-देवता का वास मानकर उनकी पूजा की जाती है। वृक्षों को देवता मानकर "वृक्ष देवो भव" कहा गया है। वेदों, पुराणों, मनुस्मृतियों, महाभारत, रामायण, रामचरितमानस, बौद्ध ग्रंथ, जैन ग्रंथ आदि धर्मग्रंथों एवं प्रचीन ग्रंथों में वन वृक्षों के महत्व, उनकी सुरक्षा एवं उनके संरक्षण के तथ्यों को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है ।

विश्व में कोई भी देश ऐसा नहीं है, जहां वृक्षारोपण हेतु त्यौहार मनाया जाता है। किन्तु अपने देश में ऐसा त्योहार मनाया जाता है, जिस दिन प्रत्येक व्यक्ति के लिए वृक्षारोपण करने का विधान बनाया गया है। इसे ब्राहम्ण पर्व कहा गया है। अर्थात वृक्षारोपण को ब्रह्मकर्म के समान मानकर उसे महत्व प्रदान किया गया है। आचार्य श्रीराम शर्मा ने वृक्षों में त्रिदेव का गुण माना है। यही कारण है कि हमारी सम्पूर्ण संस्कृति ही वन संस्कृति रही है, जो वन प्रधान है। ऋग्वेद में वन देवियों की अर्चना की गयी है। मनुस्मृति में वृक्ष को विनष्ट करने वालों को पापी मानकर उनके लिऐ दण्ड का विधान बनाया गया है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख आया है कि" जो मनुष्य वृक्ष काटता है, उसे दण्डित कियि जाय"। सड़कों एवं तालाबों के किनारे स्थित पेड़ों को काटने पर भी दण्ड देने का विधान था। 

मत्स्यपुराण में उल्लेख आया है कि जो वृक्षारोपण करता है, वह 30 हजार पितरों का उद्धार करता है। अग्नि पुराण में भी वृक्ष पूजा पर जोर देते हुए कहा गया है कि वृक्षारोपण प्रेमपूर्वक करना चाहिए एवं उसका परिपालन पुत्र के समान करना चाहिए। मत्स्यपुराण मे उल्लेख आया है कि" दस कुँआ खुदवाने का फल एक तालाब खुदवाने के बराबर है, दस तालाब खुदवाने का फल एक झील खुदवाने के बराबर है, दस झील बनवाने का फल एक पुत्र प्राप्त करने के बराबर है, किन्तु दस पुत्र उत्पन्न करने का फल एक वृक्ष लगाने मात्र से ही मिल जाता है। 

वृक्षों को महत्व प्रदान करते हुए स्वयं भगवान ने भी कहा है कि "अश्वत्थः सर्व वृक्षाणां" अर्थात" मैं वृक्षों में अश्वत्थ हूं"।

मां सीता को जब रावण लंका में ले गया तो वह अशोक वन में रहना पसंद की। पार्वती देवदारू वृक्षों को पुत्रवत मानते हुए प्रतिदिन जल से सिंचित कर उसे पुष्पित-पल्वित किया।

भारतीय संस्कृति में वृक्षों को सुरक्षित एवं संरक्षित रखने की दृष्टि से ही सभी महत्वपूर्ण एव औषधीय वृक्षो, वनस्पतियो एवं लताओं पर देवी -देवताओं का वास मानकर उनके पूजा का विधान बना दिया गया ताकि कोई उनको क्षति न पहुंचाए। यही नहीं प्रचीन भारतीय मूर्तिकला एवं चित्रकला में भी वृक्षों एवं पुष्प लतावों विशेष स्थान दिया गया है।सिन्धु घाटी सभ्यता से प्राप्त अवशेषों पर भी वृक्ष एवं पुष्प चित्रित हैं। रामायण एवं महाभारत के अधिकांश घटनास्थल वनों में या वन वृक्षों के नीचे ही घटित दिखाए गये हैं। 

पुराणों में तो वृक्षों के महत्व, वृक्षारोपण के लाभ एवं पुण्यफल तथा वृक्ष काटने से लगने वाले पापों का विस्तृत चर्चा की गयी है। अग्निपुराण में वृक्षारोपण के महत्व को बताते हुए कहा गया है कि" जो मनुष्य लोगों के हित के लिए वृक्षारोपण करता है वह मोक्ष को प्राप्त होता है। वृक्ष लगाने वाला मनुष्य अपने 30,000 भूत एवं भावी पितरों को मोक्ष दिलाने में सहभागी बनता है। अग्नि पुराण मे वास्तुशास्त्र के अनुसार वृक्षों को मकान के चारों कोणों पर लगाने का उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार घर के उत्तर में पलाश, दक्षिण में आम, पूरब में बड़ एवं पश्चिम में अश्वत्थ का वृक्ष लगाना चाहिए। दक्षिणवर्ती सीमा पर काँटेदार झाड़ी एवं घर के पास ही फूलों कि बगीचा लगाना चाहिए, जिसमें शीशम के पेड़ भी लगाए जाएं।

सम्भवतः वृक्षों एवं वनस्पतियों के महत्व एवं उपयोगिता को देखते हुए ही विष्णु स्मृति में कहा गया है कि--

"वृक्षारोपिता एव परलोके सुतारस्मृताः।
वृक्षप्रदो वृक्ष पुष्पै दे
वीन्प्रीणयति सदा।।
फलैश्च वृक्ष पुष्पै छाययाभ्यागतान्तथा।
देवे वर्षत्युदकेन पितृन् तर्पयति सदा।।
पुष्प दानेन लोकेअस्मिन् श्रीमान् भवति निश्चितम्।।
कूपाराम तडागांश्च देवतायतनानि च।
पुनः संस्कारकर्त्ताअपि लभते मौलिकं फलम्।।

अर्थात् जो मानव वृक्ष रोपित करता है, वे वृक्ष उसके पुत्र के रूफ में परलोक में जन्म लेते हैं। वृक्षों का दान देने वाला उसके फूलों से देवताओं को प्रसन्न करता है। फलों द्वारा अतिथियों को संतुष्ट करता है एवं गर्मी तथा वर्षा में छाया द्वारा पथिकों को सुख प्रदान करता है। पुष्पों -फुलों का दिन करने वाला व्यक्ति श्रीमंत बनता है। 

इस प्रकार स्पष्ट है हमारी भारतीय संस्कृति पूर्णरूपेण वन संस्कृति है और इसी वन संस्कृति में सरस्वती नदी के तट पर सभ्यता एवं संस्कृति प्रस्फुटित हुई जो आज तक अक्षुण बनी हुई है। किन्तु वर्तमान युग में हम विकास की अंधी दौड़ में अपनी भोगवादी प्रवृत्ति एवं विलासितापूर्ण जीवन जीने के लिए पूरी वन संस्कृति को ही विनष्ट करने पर तुलें हुए हैं और इस कदर वनों का सफाया करते जा रहे हैं कि अनेक वृक्ष प्रजातियाँ सदैव के लिए समाप्त हो गयीं। पश्चिमी सभ्यता के रंग म़े रंगे आज हम क़करीट के जंगल खड़े करते जा रहे हैं, जिससे बहुत दिनों तक हमारा भला हैने वाला नहीं है। यदि यही स्थिति रही तो हमारा विनाश निश्चित है। इसको देखते हुए आज आवश्कता इस बात की है कि हम पुनः अपनी वन संस्कृति की तरफ लौटें, अधिक से अधिक वृक्षारोपण करें तथा वनों को सुरक्षित एवं संरक्षित करें। इसके लिए जन-जन को अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर इसे जन आन्दोलन बनाना होगा।