डर लगता है
May 29, 2020 • गुरुकुल वाणी

यह कविता "डर लगता है" वृषल चव्हाण के द्वारा लिखी गयी है जिनकी आयु मात्र १६ वर्ष है। वे अहिन्दी भाषी क्षेत्र महाराष्ट्र के नान्देड़ शहर से आते हैं। वृषल की इस कविता की प्रौढ़ता रेखांकित करने योग्य है। मुझे लगता है कि आने वाले समय में वे महत्वपूर्ण लेखन करेंगे।

डर लगता है
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डर लगता है
कुछ कहने से डर लगता है
कुछ सुनने से डर लगता है
कुछ पढने से डर लगता है
कुछ लिखने से डर लगता
कुछ सोचने से भी डर लगता
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आसपास देखने से डर लगता है

आसपास कहीं लोग 
यहाँ से वहाँ जा रहे है
“कहाँ जा रहे हो भाई?”
यह पूछने से डर लगता है

मेरे हाथ में तो दुनिया का
सर्वश्रेष्ठ हथियार है
जिसके घाव कभी मिटते नही
पता नही क्यों पर उसे
इस्तेमाल करने से डर लगता है

किसी सार्वजनिक कार्यक्रम या समारंभ में

बैठने या बोलने से डर लगता है
डर लगता है कि मेरे मुँह से 
कुछ गलत न निकल जाए
और उनकी कीमत मेरे प्रियजनों 
और परिचितों को न चुकानी पड़े

आजकल तो सामाजिक और राजनीतिक
प्रश्नो पर बोलने वालों को ‘देशद्रोही’ 
और प्रश्न निर्माण करने वालों को
’देशप्रेमी’ या ‘देशभक्त’ कहते है,
क्या यही हैं अच्छे दिन?

यह सवाल पूछने से डर लगता है

डर लगता है रात के समय
कोई धमकी वाला फोन न आ जाये
और मेरा अंत न हो जाये 
डर लगता है  कहीं आज हँसने वाले
हम कल का सूरज न देख पायें

रघुवंश मणि 
एसोसिऐट प्रोफेसर
किसान पीजी कालेज बस्ती