देशभक्ति, राष्ट्रप्रेम व बलिदान के प्रतिमूर्ति थे महाराणा प्रताप : सौरभ पाण्डेय
May 9, 2020 • गुरुकुल वाणी

महाराणा प्रताप जयंती आज, जानें इस महान योद्धा के जीवन से जुड़ी 5 खास बातें

सलेमपुर, देवरिया। देशभक्ति व राष्ट्रप्रेम तथा बलिदान के प्रतिमूर्ति थे महाराणा प्रताप उक्त बातें महाराणा प्रताप की जन्म जयंति पर आयोजित एक छोटे से कार्यक्रम के दौरान हिन्दू राष्ट्र सेना के देवरिया जिला उपाध्यक्ष सौरभ पाण्डेय ने कही।
महाराणा प्रताप की जयंती आज तहसील क्षेत्र के ग्राम गुमटही में सामाजिक दूरी बनाते हुए छह सात लोगों ने मनाया।इस अवसर पर महाराणा प्रताप के जीवन से संबंधित घटनाओं का उल्लेख करते हुए हिन्दू राष्ट्र सेना के देवरिया जिला अध्यक्ष सांकृत्यायन रवीश पाण्डेय ने कहा कि महाराणा प्रताप का जीवन शौर्य व साहस का प्रतीक है जिससे आज के युवाओं को प्रेरणा लेनी चाहिए।
 आज भारत के वीर सपूत, महान योद्धा और अदभुत शौर्य व साहस के प्रतीक महाराणा प्रताप की जयंती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 को कुंभलगढ़ दुर्ग (पाली) में हुआ था। लेकिन राजस्थान में राजपूत समाज का एक बड़ा तबका उनका जन्मदिन हिन्दू तिथि के हिसाब से मनाता है। इस महान योद्धा के जीवन से जुड़ी 5 खास बातें👉🏻

*1⏭️* महाराणा प्रताप का जन्म महाराजा उदयसिंह एवं माता राणी जीवत कंवर के घर में हुआ था। उन्हें बचपन और युवावस्था में कीका नाम से भी पुकारा जाता था। ये नाम उन्हें भीलों से मिला था जिनकी संगत में उन्होंने शुरुआती दिन बिताए थे। भीलों की बोली में कीका का अर्थ होता है - 'बेटा'।

*2⏭️* महाराणा प्रताप के पास चेतक नाम का एक घोड़ा था जो उन्हें सबसे प्रिय था। प्रताप की वीरता की कहानियों में चेतक का अपना स्थान है। उसकी फुर्ती, रफ्तार और बहादुरी की कई लड़ाइयां जीतने में अहम भूमिका रही। 

*3⏭️* वैसे तो महाराणा प्रताप ने मुगलों से कई लड़ाइयां लड़ीं लेकिन सबसे ऐतिहासिक लड़ाई थी- हल्दीघाटी का युद्ध जिसमें उनका मानसिंह के नेतृत्व वाली अकबर की विशाल सेना से आमना-सामना हुआ। 1576 में हुए इस जबरदस्त युद्ध में करीब 20 हजार सैनिकों के साथ महाराणा प्रताप ने 80 हजार मुगल सैनिकों का सामना किया। यह मध्यकालीन भारतीय इतिहास का सबसे चर्चित युद्ध है। 

इस युद्ध में प्रताप का घोड़ा चेतक जख्मी हो गया था। इस युद्ध के बाद मेवाड़, चित्तौड़, गोगुंडा, कुंभलगढ़ और उदयपुर पर मुगलों का कब्जा हो गया था। अधिकांश राजपूत राजा मुगलों के अधीन हो गए लेकिन महाराणा ने कभी भी स्वाभिमान को नहीं छोड़ा। उन्होंने मुगल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और कई सालों तक संघर्ष किया। 

*4⏭️* 1582 में दिवेर के युद्ध में राणा प्रताप ने उन क्षेत्रों पर फिर से कब्जा जमा लिया था जो कभी मुगलों के हाथों गंवा दिए थे। कर्नल जेम्स टॉ ने मुगलों के साथ हुए इस युद्ध को मेवाड़ का मैराथन कहा था। 1585 तक लंबे संघर्ष के बाद वह मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे।  
महाराणा प्रताप जब गद्दी पर बैठे थे, उस समय जितनी मेवाड़ भूमि पर उनका अधिकार था, पूर्ण रूप से उतनी भूमि अब उनके अधीन थी। 

*5⏭️* 1596 में शिकार खेलते समय उन्हें चोट लगी जिससे वह कभी उबर नहीं पाए। 19 जनवरी 1597 को सिर्फ 57 वर्ष आयु में चावड़ में उनका देहांत हो गया।

*सांकृत्यायन रवीश पाण्डेय*