धान की फसल में लगी हल्दी रोग के प्रकोप से बचने के लिए करें दवा का छिड़काव : चंद्रकांत तिवारी
October 13, 2020 • गुरुकुल वाणी

*अभिजीत त्रिपाठी की रिपोर्ट..*

भाटपार : किसान खरीफ मौसम में धान की खेती को प्रमुख मानते हैं. इसकी उन्नत खेती नर्सरी से लेकर बीज की मात्रा, बीज उचपार, बुवाई, सिंचाई समेत कई महत्वपूर्ण प्रंबध पर निर्भर होती है. जो किसान बखूबी इसको अच्छी तरह से करते हैं फिर भी किसानों को कभी सरकार की योजनाओं उन तक ना पहुंच पाना तो कभी प्राकृतिक आपदा किसानों के ऊपर टूट पड़ती है अभी कुछ दिन पहले असमय भारी मात्रा में बारिश होने के कारण किसानों की फसलें काफी नुकसान हुई थी अभी इस समस्या से किसान धीरे-धीरे उबर ही रहे थे कि उनके सामने एक और बड़ी समस्या सामने खड़ी हो गई किसानों के लहलाते धान की फसलों में पीला हल्दी रोग काफी दिखाई दे रहा है जिससे किसान की फसलें उसके चपेट में आने से काफी नुकसान हो रहे हैं कृषि विशेषज्ञों की माने तो यह रोग धान की फसल में रोगों का प्रकोप पैदावार को पूरी तरह से प्रभावित कर देता है. कंडुआ एक प्रमुख फफूद जनित रोग है, जो कि अस्टीलेजनाइडिया विरेन्स से उत्पन्न होता है. इसका प्राथमिक संक्रमण बीज से होता है, इसलिए धान की खेती में बीज शोधन करना अति आवश्यक है. इसका द्वितीय संक्रमण वायु जनित बीजाणु द्वारा होता है.

बता दें कि इसके प्रकोप से धान की बालियों के दाने की जगह पीले रंग का बाल बन जाता है. इसके बाद यह काले रंग का हो जाता है. इसको कई किसान हल्दिया रोग भी कहते हैं. यह रोग धान की 60 से 90 प्रतिशत फसल को प्रभावित कर सकता है. अगर तापमान अधिक हो और हवा में आर्द्रता अधिक हो, तो यह रोग तैजी से फैलने लगता है. इसके अलावा धान की खेती में यूरिया का अधिक उपयोग करने से यह बीमारी बढ़ सकता है कृषि विशेषज्ञ सी के तिवारी का मानना है कि जब धान में बाली आने लगती हैं, तब लगभग 500 मिलीलीटर प्रोपीकोनाजोल को लगभग 400 लीटर पानी में घोल लें और प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़क दें. अगर बालियों में दाने की जगह कंडुआ दिखाई दे, तो तुरंत बालियों को सावधानी से तोड़कर थैलियों में भरकर मिट्टी में गाड़ दें. इससे बीजाणुं हवा में उड़ नहीं पाएंगे. इस तरह धान की फसल कंडुआ रोग के प्रकोप से बच सकती है.