नवरात्रि
March 26, 2020 • गुरुकुल वाणी

नवरात्रि का पर्व प्रत्येक वर्ष भारतीय समाज में दो बार मनाया जाता है। प्रथम चैत्र नवरात्रि जाड़े और गर्मी के संधिकाल में एवं द्वितीय शारदीय नवरात्रि बरसात एवं जाड़े के संधिकाल में। भारतीय समाज इन नौ दिनों में काफी सात्विकता एवं सफाई का रहन-सहन अपनाता है। यहाँ तक कि आचार, विचार, आहार, वस्त्र इत्यादि में भी पूर्ण रूप से सफाई एवं सात्विकता का पालन किया जाता है। घरों को साफ-सुथरा रखा जाता है एवं निरामिस भोजन पर पूर्णतया प्रतिबन्ध रहता है। प्रत्येक दिन हवन-पूजन किया जाता है। मन्दिरों में हवन-आरती का प्रतिदिन सुबह-शाम आयोजन होता है। इस प्रकार एक ऐसा परिवेश तैयार हो जाता है जिससे चारों तरफ का वातावरण हवन के धुएँ की सुगन्ध से परिपूर्ण हो जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अगर इसका विश्लेषण किया जाए तो यह स्पष्ट होता है कि विभिन्न मौसमों के संधिकाल में वातावरण काफी दूषित रहता है। विभिन्न प्रकार के जीवाणु, विषाणु एवं कीटाणु सम्पूर्ण वातावरण में अपनी सर्वाधिक संख्या में एवं अधिकतम शारीरिक बल के साथ उपलब्ध रहते हैं। वास्तव में जाने वाले मौसम के पोषित सूक्ष्म जीव खत्म नहीं हुए रहते हैं और आने वाले मौसम में उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म जीव अनुकूल परिस्थितियों की वजह से पैदा हो जाते हैं जिससे सम्पूर्ण वातावरण में मनुष्यता, जीव-जन्तुओं एवं पादपों के लिए हानिकारक सूक्ष्म जीवों की विशाल फौज तैयार हो जाती है। इसके अतिरिक्त संधिकाल का मौसम भी काफी असामान्य सा रहता है। साधारणतया रातें जाने वाले मौसम की भाँति एवं दिवस आने वाले मौसम की भाँति होती हैं। सुबह और शाम का मौसम तो और भी खतरनाक स्वभाव का होता है। इसकी वजह से भी जीव-जन्तुओं एवं पादपों के स्वास्थ्य पर काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस त्वरित एवं निरन्तर परिवर्तन की वजह से जीवों एवं पादपों की प्रतिरोधक क्षमता काफी कम हो जाती है और कोई-न-कोई रोग जीवों एवं पादपों में प्रभावी हो जाता है। प्रतिरोधक क्षमता की कमी एवं वातावरण में हानिकारक सूक्ष्मजीवों की अधिकता सम्पूर्ण जीवधारियों के लिए काफी नुकसानदेह एवं खतरनाक साबित होते हैं और इसकी भारी कीमत जीवधारियों को उठानी पड़ती है। सूक्ष्म हानिकारक जीवों से सुरक्षात्मक उपाय के रूप में भारतीय समाज इस सफाई, हवन-पूजन, खान-पान, पहनावा इत्यादि का पालन करता हैं यह सर्वविदित है कि हवन का धुआँ सूक्ष्म जीव प्रतिरोधी होता है जिससे इन खतरनाक सूक्ष्मजीवों से सुरक्षा होती है।

हवन-पूजन के धुएँ से ये सूक्ष्मजीव या तो समाप्त हो जाते हैं या उस वातावरण, जहाँ तक हवन के धुएँ का प्रभाव रहता है, उससे दूर चले जाते हैं। इस प्रकार हमारी मानवता, जीव-जन्तु एवं पादप सूक्ष्म जीवों के दुष्प्रभाव से सुरक्षित हो जाते हैं। इतना ही नहीं, जीवों की प्रतिरोधक क्षमता पर भी इस धुएँ का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और प्रत्येक जीवधारी अपनी सुरक्षा करने हेतु आन्तरिक एवं बाह्य रूप से सक्षम हो जाता है। नवरात्रि के समय विभिन्न मंत्रों के जाप का भी भारतीय समाज में प्रचलन है। वैज्ञानिक तथ्य यह भी स्पष्ट करते हैं कि विभिन्न प्रकार की ध्वनि तरंगों में भी विभिन्न प्रकार के गुण पाए जाते हैं। मन्त्रों द्वारा उत्पन्न ध्वनि तरंगों में भी जीवाणुनाशक गुण विद्यमान होने की पुष्टि हुई है। नवरात्रि के विशेष मंत्र भी सम्भवतः उस समय उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म जीवों को शमन करने में सक्षम होंगे। इस तथ्य की वैज्ञानिक जाँच की भी आवश्यकता है और अगर यह सही है तो इसे और संवर्धित एवं व्यापक करने की भी। इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारी संस्कृति का यह महत्वपूर्ण पर्व जीवधारियों के लिए कितना महत्वपूर्ण है। इसे मात्र एक आयोजन मान लेना या परम्परा की संज्ञा देना बुद्धिमानी नहीं होगी।

हमारी संस्कृति का यह प्रमुख पर्व एक निश्चित प्रयोजन हेतु समाहित किया गया है और इसका बहुत ही दूरगामी परिणाम निहित है। इसे ढकोसला या आयोजन मानकर गलती करने वाले आवाम को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने इस प्रमुख पर्व का वैज्ञानिक विश्लेषण कर इसके महत्वपर्ण पहलुओं को संवर्धित करें एवं इसके हितार्थ का अनुपालन सुनिश्चित करने का प्रयास करें।

-सुमन बी आनन्द