पर्यावरण/पारिस्थितिकी संतुलन हेतु ची-ची करती, फुदकती, चहचहाती गौरैया को बचाना आवश्यक-डा० गणेश पाठक
March 19, 2020 • गुरुकुल वाणी

20 मार्च, विश्व गौरैया दिवस पर विशेष-

विश्व गौरैया दिवस के अवसर पर "समग्र विकास एवं शोध संस्थान, बलिया" के सचिव पर्यावरणविद् डा० गणेशकुमार पाठक ने एक भेंटवार्ता के दौरान विस्तृत चर्चा मे बताया कि एक समय था जब नन्ही सी फुदकती, ची-ची करती चहचहाती गौरैया हमारे आँगन का शोभा बढ़ाया करती थी और बच्चों सहित बड़ों का भी मनोरंजन करती हुई पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी को भी संतुलित बनाए रखने में अहम् भूमिका निभाती थी। किन्तु मानव द्वारा इनके आवास, आहार, पर्यावरण, दिनचर्या को इस कदर विनष्ट, अव्यवस्थित एवं असंतुलित किया गयाकि यह नन्ही चिड़िया इस तरह घटती गयी कि अब इनका दर्शन करना भी दुर्लभ होता जा रहा है, जिसके चलते इसको दुर्लभ प्रजाति में शामिल कर लिया गया है।

वैसे गौरैया को पक्षी विज्ञानी पासेराडेई परिवार की सदस्य मानते हैं, किन्तु कुछ वैज्ञानिक इसे वीवर फिंच परिवार का मानते हैं। गौरैया एक बार में प्रायः तीन बच्चों को जन्म देती हैं। भोजन की तलाश में इनके द्वारा अधिकतम् तीन किमी० तक की दूरी तय की जाती है। 

पक्षी विज्ञानियों द्वारा किए गए अध्ययनों के अनुसार गौरैया की आबादी घटकर खतरनाक स्तर तक पहुँच गयी है।आंध्र विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक अध्ययं के अनुसार गौरैया की आबादी में 60 प्रतिशत तक की कमी आ गयी है, जब कि  पक्षी विज्ञानी हेमन्त सिंह के एक अध्ययन के अनुसार गौरैया की आबादी में 60 से 80 प्रतिशत तक की कमी आ गयी है। यही नहीं ब्रिटेन की "राँयल सोसायटी आँफ प्रोटेक्शन आँफ बर्ड्स" द्वारा भारत सहित विश्व के अनेक क्षेत्रों में किए गए अध्ययन के आधार पर गौरैया को लाल सूची ( रेड लिस्ट) अर्थात् खतरनाक सूची में डाल दिया गया है। हमारे घरों को अपनी चहचहाटट से गुलजार करने वाली गौरैया का अब दर्शन भी मुश्किल से ही हो पा रहा है।

क्यों विलुप्त हो रही है गौरैया -

इस नन्ही चिड़िया के विलुप्त होने के एक नहीं, अनेक कारण हैं।सबसे प्रमुख कारण है इनका वास स्थान समाप्त होना । पहले चारों तरफ वन-वृक्ष, बाग-बागीचे, झाड़ियाँ एवं लताएँ थीं, जिनमें गौरैया अपना बसेरा बनाती थी और अपनी प्रजनन क्रिया से अपनी आबादी में अभिवृद्धि करती थीं। किन्तु धीरे-धीरे सभी वृक्ष एवं झाड़ियाँ समाप्त हो गए, जलाशय भी समाप्त हो गए। मानव द्वारा रोपित बाग-बागीचे एवं झाड़ियाँ भी विभिन्न कार्यों हेतु समाप्त कर दिए गये। पोखर, ताल, तलैया पाट दिए गए। फलतः इनके आवास स्धल पूर्णतः समाप्त हो गए। यही नहीं पहले गाँवों के घर भी प्रायः खपरैल या छप्पर (घास- फूस) के होते थे, जिनमें गौरैया अपना घोसला बनाकर  हमारे सहचर के रूपमें रहती थीं। किन्तु अब गाँवों के घर भी कँकरीट के हो गए हैं, जिससे इनका आवास छिन गया है। नगरों की स्थिति तो और बदतर हो गयी है।

गौरैयों के विलुप्त होने का दूसरा कारण इनके आहार का उपलब्ध न होना एवं आहार दूषित तथा विषैला होना।इनके बच्चे प्रारम्भ में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध कीड़ों को ही अपना आहार बनाते थे। फिय धीरे- धीरे विभिन्न तरह के अनाज आदि को खाते थे।किन्तु आधुनिक कृषि के चलते कीटनाशक एवं खर-पतवारनाशक विषैले रसायनों के प्रयोग से इनके आहार के रूपमें उपलब्ध कीड़े-मकोड़े या तो समाप्त हो गये या विषैले हो गये, जिनको खाने से इनका भी विनाश होने लगा. यही नहीं रासायनिक उवर्रकों एवं विषैली दवाओं के प्रयोग से अनाज भी विषैला हो गया है , जिसको खाने से इनकी प्रजनन क्रिया तक प्रभावित हो रही है। एक अध्ययन से यह भी तथ्य सामने आया है कि मोबाईल टावरों एवं मोबाइल से निकलने वाला रेडिएशन भी इनको बूरी तरह से प्रभावित कर रहा है और इनकी प्रजनन क्रिया समाप्त होती जि रही है। वर्तमान समय में यह भी देखने में आ रहा है कि सुरक्षित घोसलों के अभाव में कौए या अन्य शिकारी पक्षियाँ इनके अण्डे को नष्ट कर देते हैं या खा जाते है। अनेक क्षेत्रों में इन मासूम नन्हीं गौरैयों के शिकार कर मारने की भी बातें सामने आती रहती हैं। इन सबके चलते इस चहचहाती गौरैया की संख्या अब इतनीक्षकम हो गयी है कि इनकी चहचहाटट भी अब सुनने को नहीं मिल रही है।

क्यों मनाया जाता है गौरैया दिवस-

गौरैया की सिमटती संख्या को देखते हुए ही नासिक निवासी पक्षी विज्ञानी मोहम्मद दिलावर द्वारा घरेलू गौरैयों को संरक्षण प्रदान करने हेतु "नेचर फार एवर सोसायटी" की स्थापना की गयी और लोगों को जागरूक करने का काम किया जाने लगा। इनके किए कार्यों को देखते हुए वर्ष 2008 में इन्हें टाईम द्वारा "हिरोज आफ दि इन्वायरमेंटल" नामक पदवी से नवाजा गया। इसके बाद "नेचर फार एवर सोसायटी" एवं फ्रांस की संस्था " इको सिस एक्शन फाउँडेशन" द्वारा 20 मार्च ,2010 को गौरैया के संरक्षण एवं जन जागरूकता हेतु प्रतिवर्ष "विश्व गौरैया दिवस" मनाने का निर्णय लिया गया, जिसमें मोहम्मद दिलावर की महत्वपूर्ण भूमिका रही। तभी से प्रतिवर्ष 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। यही नहीं गौरैया के संरक्षण हेतु एवं जनजागरूकता हेतु 9 जुलाई, 2010 को भारतीय डाक विभाग द्वारा गौरैया पर डाक टिकट भी जारी किया गया। साथ ही साथ दिल्ली में गौरैया की दुर्लभता को देखते हुए एवं संरक्षण हेतु दिल्ली सरकार द्वारा वर्ष 2012 को गौरैया को राज्य पक्षी घोषित किया गया।

कैसे करें गौरैया का संरक्षण

यदि हम मानें तो गौरैया एक पक्षी ही नहीं ,बल्कि पुराने दिनों को याद करें तों यह हमारे जीवन का, हमारे दिनचर्या का एवं हमारे परिवार का एक अभिन्न अंगहरही है। यह हमारे पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी का रक्षक है।अतः हमें येन-केन- प्रकारेण इनका संरक्षण करना आवश्यक है। सबसे आवश्यक यह है कि हम गाँव में रहते हों या नगर में अपने आवास में ऐसी थोड़ी जगह अवश्य छोड़ें जहाँ कमसे कम एक गौरैया के आवास हेतु एक छोटी झाड़ी लगा सकें। यदि यह सम्भव नहीन है तो हम अपनी छत पर भी गमले में छोटी झाड़ी लगाकर उनके आवास की व्यवस्था कर सकते हैं। जहाँ तक इनके आहार का प्रश्न है तो सम खाली स्थान पर या अपनी छत पर अनाजक्षके दाने छिटक कर रख सकते हैं एवं किसी बर्तन में पीने का पानी भी रख सकते हैं। वर्तमान समय में कृतिम घोसलें भी मिल रहे हैं जिनको लाकर हम झाड़यों में रखकर या अपने बरामदे में रखकर उनके आवास की व्यवस्था कर सकते हैं। जैसे भी इन्हें हमें बचाना है, अन्यथा वह दिन दूर नहीं, जब कुछ अन्य पक्षियों की तरह यह गौरैया भी हमें कभी दिखाई नहीं देगी।

                          डा० गणेश कुमार पाठक