संघर्ष की राजनिती और दलगत कार्यकर्ता : शिवाकांत तिवारी
August 18, 2020 • गुरुकुल वाणी

आज राजनिती की बात होती है संघर्ष की बात होती है और दलगत कार्यकर्ता की बात जब समाज मे होती हैं तो एक विकट समस्या नजर आती हैं। सबसे पहले संघर्ष -पुराने समय में जब सत्ता से दूर होकर कार्यकर्ता कार्य करता और अपने दल के प्रति समर्पण रखता था उस वक्त दलगत राजनिती मे कार्यकर्ता की महत्ता थी लेकिन समय ने आज बदलाव ले रखा है सत्ता के लिए राजनिती मे आये राजनीतिक पार्टी अपने कार्यकर्ता को तवज्जों नही दे रही जिसके कारण कार्यकर्ता उदासिन होता नजर आ रहा है और अपने आप को ठगा महशुस कर रहा है। उसे पता है कि संघर्श एक शब्द है अपने दल के प्रति संघर्श करना और अपने राजनीतिक अगुआ पर भरोसा रखना मूर्खता है। आज विकास के लिए सभी कार्यकर्ता समर्पित है बुथ लेवल की राजनिती को पार्टीया महत्व दे रही है बुथ के जीत को आधार मानकर कार्यकर्ता का समायोजन किया जा रहा है इसमे सबसे बड़ी बात यह है कि आप कई दल से आकर सत्ताधारी दल मे अपना योगदान करेंगे उस वक्त पार्टी आपको पुरा सम्मान करेगी और समायोजन मे आपको अवश्य रखा जायेगा।

दलगत कार्यकर्ता -

एक निशान एक पार्टी, एक विधान, पर कार्य संगठन के लिये कर्ता है उसने अपने जीवन का लक्ष्य अपने दल को ही मान लिया है जो एक तरह से समर्पित कार्यकर्ता के सम्मान मे देखा जाता है। इस कार्यकर्ता का उपयोग पार्टी मे प्रमुख रुप से किया जाता है। उन्हे संगठन मे दायित्व देकर जीवन की रेखा को दल संगठन और समर्पण मे समाहित कर उन्हे एक पुराने संघर्श और सामाजिक कार्यकर्ता माना जाता है। ये दलगत कार्यकर्ता का उपयोग सत्ता सुख मे नही लिया जाता है। इनकी गाथा अमर की जाती है। और इनके संघर्श को आने वाले नये कार्यकर्ताओ मे बताया जाता है। ज़िससे नये कार्यकर्ता रूपी पौधा का समाज मे निर्माण हो सके। भारतीय राजनिती मे सत्ता के लिए कार्यकर्ता का बलिदान एक अमर गाथा है जिसे अपने सत्ता और हितो के लिये समाज मे प्रदर्शित किया जाता है।