सरकार बनाम दुकानदार वर्तमान आर्थिक परिदृश्य
November 12, 2019 • गुरुकुल वाणी

सरकार बनाम दुकानदार 
 सरकारें कल्याणकारी स्वभाव की जबकि दुकानदारों का स्वभाव लाभकारी होता है | सरकारें लोक कल्याणकारी दायित्वों की पूर्ति के लिये बनायी जाती हैं जबकि दुकानदार लाभकारी कार्य करतें है | लोक कल्याणकारी सरकारें अपने समस्त आवाम के हितो को ध्यान में रख कर नीतियाँ और योजनाओं को निर्धारित करतीं है, जबकि दुकानदार लाभकारी योजनाओं को बनाते है और अपने लिए ऐसी ही नीतियाँ निर्धारित करने की सरकारों से अपेक्षा भी रखते है | सरकारें कई ऐसी नीतियाँ और योजनायें बनाती हैं जिसमे घाटा होता है, यहाँ तक की पूरी योजना व्यय से एक भी पैसे की आय नही होती परन्तु एक बड़ी आबादी की जरूरतें और खुशहाली सुनिश्चित होती है | परन्तु दुकानदार चाहे पूरी आवाम नष्ट हो जाये अपना एक भी पैसे का घाटा नही उठा सकता | सरकार और दुकानदार में मूलतः यही फर्क है कि सरकार लोक कल्याण पर धन व्यय करती है, जबकि दुकानदार मुनाफे की उम्मीद पर ही अपनी पूजी व्यय करतें है | सरकार यह सुनिश्चित करती है कि देश की कहीं की कोई आबादी विकास से अछूती न रह जाये जबकि दुकानदार की सोच  मात्र अपने विकास तक ही सीमित रहती है | यहाँ तक कि पूजीवादी सरकारें भी लोक कल्याण पर भारी व्यय करती हैं और यह सुनिश्चित करतीं है कि कोई भी आबादी इस प्रतिस्पर्धा वाले युग में बिकास और मूल भूत आवश्यकताओं से बंचित न रह जाये | सरकारों का दायित्व अपनी समस्त आवाम के लिये मूलभूत आवश्यकतायें जैसे शिक्षा, चिकित्सा, आवास, भोजन, इत्यादि को उपलव्ध कराना और ऐसे रोजगारों के अवसर तैयार करना होता है जिससे आम आदमी अपने स्वयं की कमाई से अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम हो जाये | जबकि दुकानदार मात्र अपने मुनाफे पर ही केन्द्रित रहते हैं |  सरकारें रोजगार उत्पन्न करने वाले उधोग धन्धों को खुद भी निर्मित और विकसित करती हैं और पूँजीपतियों को भी विभिन्न सहायता के माध्यमों या नीतियाँ निर्धारित कर कल - कारखानें लगनें में सहयोग करती हैं | घाटे में चल रहे उधमो को बन्द होने से बचाने हेतु विभिन्न करों की माफी व पूँजी उपलव्ध कराती हैं ताकि रोजगार के अवसर बन्द न हो जायें | सरकारे घाटे - मुनाफे की बजाय रोजगार के अवसरों को जिन्दा रखने का प्रयास करती रहती हैं जबकि दुकानदार  घाटे की स्थिति में अपने उधमों को बन्द कर देते हैं |
 सरकार की आय का मुख्य स्रोत विभिन्न कर होतें हैं जो इस दर्शन के आधार पर निर्धारित किये जाते हैं कि धनी वर्ग बहुत अधिक धन अर्जित न कर सके और गरीब बहुत ज्यादे गरीब न होने पाये | इसीलिये धनी वर्ग से कुछ पैसा कर के रूप में लेकर गरीबों के लिए रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन इत्यादि का इन्तजाम बिभिन्न देशों की सरकारों द्वारा किया जाता है | यानि विभिन्न कर  प्रणालियों का दर्शन अमीर-गरीब के बीच की खाईयों को पाटना या उन्हें बढ़ने से रोकने का होता है | इसी लिये सरकारे अमीरों से विभिन्न करों के माध्यम से धन अर्जित कर आम जनता के लिये रोजगार के साधन, स्कूल, चिकित्सालय, रेल, बस, विजली इत्यादि के विकास पर खर्च करती है | गरीबों को रोजगार उपलव्ध कराने के उदेश्य से सरकारे विभिन्न मिलें, कारखानें बनवाती है , निर्माण क्षेत्र जैसे सड़क मार्ग, रेल मार्ग इत्यादि का भी विकास करती हैं | कल कारखानों के विकास में सरकार विभिन्न क्षेत्रों की आबादी और उपलब्ध कृषि उत्पादों का भी ध्यान रखती है जिससे कारखानों को कच्चा माल आसानी से उपलव्ध हो सके और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों को भी परोक्ष रोजगार मिल सके | कर प्रणाली यह सुनिश्चित करती है कि धनी और गरीब के प्रति व्यक्ति प्रतिमाह आय में एक निश्चित अनुपात कायम रहे | धनी की आय उत्तरोत्तर बढती जाय और गरीबों की घटती जाये इसी को रोकने की व्यवस्था कर प्रणालियों का मूल उदेश्य होता है |
  लोक कल्याणकारी सरकारें अपनी जनता के हितों को ध्यान में रखते हुये विभिन्न वस्तुओं को अपने वास्तविक खरीद मूल्य से कम दाम पर जनता को बेचती है, जिसे सब्सिडी कहा जाता है | सब्सिडी मूलतः जीवन उपयोगी वस्तुओं जैसे दवाईया खाद्य पदार्थ, घरेलू उपकरणों इत्यादि पर उपलव्ध करायी जाती है | कृषि प्रधान देशों में यह सस्ती बिजली, सिचाई व्यवस्था, बीज, खाद, रसायन और कृषि उपकरणों पर भी उपलब्ध करायी जाती है | सब्सिडी आम जनता की क्रय शक्ति या प्रति व्यक्ति औसत आय को ध्यान में रखकर निर्धारित की जाती है और जीवन उपयोगी वस्तुओ का मूल्य आम जनता की क्रय शक्ति के अनुरूप की जाती है | सब्सिडी का दर्शन है कि आम जनमानस को जीवनोपयोगी वस्तुये उसके क्रय शक्ति के अन्दर उपलव्ध हो सके | सब्सिडी जैसे - जैसे आम जनता कि प्रति व्यक्ति औसत आय बढ़ती जाती है वैसे - वैसे कम की जाती है जिससे आम जनमानस का जीवन सरलता पूर्वक चलता रहे | दुकानदार हमेशा अपनी वस्तुओ को उसके लागत मूल्य से बढ़ा कर ही बेचते है, यहाँ तक की सब्सिडी वाली वस्तुओ पर भी लाभ कमाना नही छोड़ते | सब्सिडी का उदेश्य गरीबों के भोजन, दवायें सस्ते से सस्ते दर पर उपलव्ध कराकर उनकी खुशहाली सुनिश्चित करना होता है |`कृषको को भी विभिन्न खाद, बीज, पानी सस्ते दरो पर उपलव्ध कराकर उत्पादन को बढाने हेतु प्रोत्साहित किया जाता है | अर्थात सब्सिडी आम जनता की आवश्यकता की पूर्ति से लेकर उनको उत्पादकता बढाने के लिए प्रोत्साहित करने तक सरकार द्धारा सुनिश्चित की जाती है | यहाँ तक की उधोग धन्धों का विकास कर रोजगार के साधन विकसित करने के लिए उधोगपतियों को भी सब्सिडी जमीनों के दामो को कम कर, सस्ती बिजली  उपलव्ध कराकर कम ब्याज पर पूँजी उपलव्ध कराकर की जाती है | सब्सिडी आम जनमानस को लागत मूल्य से कम मूल्य पर विभिन्न वस्तुओ को उपलव्ध करने की व्यवस्था का नाम है जिसका उदेश्य आम जनता को जीवनोपयोगी वस्तुये उपलव्ध कराना या उनको उत्पादकता बढाने हेतु प्रोत्साहित करना होता है |
    लोक कल्याणकारी सरकारें वास्तविक लागत मूल्य से अधिक मूल्य पर उत्पादों का विक्रय मूल्य निर्धारित  करती है और उत्पादकों से इसी निर्धारित मूल्य पर उनके उत्पाद क्रय करती हैं | इस मूल्य निर्धारण को समर्थन मूल्य कहा जाता है | इसका दर्शन उत्पादकों को एक निश्चित लाभ उपलव्ध कराना होता है, जिससे उत्पादकों में विश्वास बना रहे और उत्पादन क्षमता बढती रहे | कृषि प्रधान देशों में लगभग प्रत्येक उत्पाद का समर्थन मूल्य घोषित रहता है और प्रत्येक वर्ष निर्धारित किया जाता है और सरकारे विभिन्न क्षेत्रों में क्रय - विक्रय केन्द्र खोलकर किसानों से उनके उत्पाद खरीदतीं है | समर्थन मूल्य का उदेश्य प्रत्येक किसान को एक निश्चित मुनाफा उपलव्ध कराना होता है, जिससे उसका जीवन खुशहाल हो सके | लाभासं के साथ विभिन्न उत्पादों के मूल्य निर्धारण को समर्थन मूल्य कहा जाता है | अभी हमारे देश में कृषि उत्पादों के समस्त वस्तुओ का समर्थन मूल्य नही घोषित होते बल्कि कुछ निश्चित वस्तुओ के ही होते है | जिन वस्तुओ के समर्थन मूल्य सरकारें घोषित नही करती, उनका मूल्य  निर्धारण बाजार करता है | बाजार का मूल्य निर्धारण लोक कल्याणकारी नही होता बल्कि मांग और आपूर्ति आधारित होता है | अर्थात उत्पादकों को अक्सर लागत मूल्य से भी कम दाम पर अपने उत्पादों को बेचने को मजबूर होना पड़ता है जिससे उत्पादन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है | अभी ओधोगिक उत्पादों के समर्थन मूल्यों पर न तो कोई बहस होती है और न ही कही विचार ही हो रहा है | ओधोगिक उत्पाद पूर्णतया बाजार के अधीन है, जो लघु और कुटीर उधोग के विकसित न हो पाने के सबसे बड़े कारण है | कल्याणकारी सरकारे जब तक समस्त उत्पादों का लागत मूल्य में लाभासं जोड़कर समर्थन मूल्य नही घोषित करेगी तब तक आपार जनसंख्या वाले देशों की दशा में सुधार दिखाई नही देगा | सरकारें  लागत मूल्य में लाभासं जोडकर समर्थन मूल्य निर्धारित करती है जबकी दुकानदार न तो लागत मूल्य का ध्यान देते है और न ही लाभासं का, जिसकी वजह से कालाबाजारी पनपती है और उत्पादक हतोत्साहित होकर  उत्पादन कम या बन्द कर देते है | दुकानदार या बाजार द्वारा निर्धारित मूल्य लोक कल्याण की भावना से बहुत दूर होते है |
 सरकारों का दायित्व लोक कल्याण जबकि दुकानदारो का मात्र लाभार्जन होता है | सरकारे यह सुनिश्चित करती है कि एक निश्चित लाभासं देश के प्रत्येक व्यक्ति के जेब तक पहुँचता रहे जिससे अन्य व्यवसाय भी लाभान्वित, पुष्पित और पल्वित होते रहे | सरकारे प्रत्येक नागरिक की क्रयशक्ति विकसित करने की योजनाये विकसित करती है | सरकार के दायित्व व लोक कल्याणकारी दर्शन को समझने के लिये, एक चीनी मिल का उदाहरण लेते है | अगर सरकार एक चीनी मिल लगाती है तो कम से कम एक हजार लोगो को सीधा रोजगार देती ही, उन्हें मिल के कर्मचारी के रूप में तैनात कर | अर्थात एक हजार लोगो की क्रयशक्ति सीधे बढ़ जाती है | इनकी वजह से मिल् के आस पास एक बाजार बस जाता है, जहाँ सब्जी, फल, दवा, कपड़े, अनाज, टैम्पो, रिक्शा,स्कूल, कालेज, दर्जी,सैलून, सिनेमाहाल, इलेक्ट्रॉनिक की दुकाने, बिजली के सामान इत्यादि का क्रय - विक्रय शुरू हो जाता है | इस तरह परोक्ष रूप से उस मिल की वजह से दस बीस हजार अन्य लोगो को रोजगार मिल जाता है | आस पास के गावों में गन्ने की खेती शुरू हो जाती है जिससे खेतिहर से लेकर कृषि मजदूर तक लगभग दस बीस लाख की आबादी लाभान्वित होती है और रोजगार के साथ उनकी भी क्रय शक्ति बढ़ जाती है इसके अतिरिक्त गन्ने की सिचाई और ढुलाई हेतु भी हजारो लोगो को परोक्ष रोजगार प्राप्त होता है | अर्थात एक चीनी मिल से न केवल बीस तीस लाख आबादी को सीधे या परोक्ष रूप से रोजगार मिलता है बल्कि उस क्षेत्र की क्रय शक्ति में व्यापक विस्तार हो जाता है | बढ़ी क्रय शक्ति अन्य प्रकार के रोजगार जैसे भवन निर्माण, वाहन, मनोरंजन, शिक्षा, चिकित्सा इत्यादि को स्वतः विकसित कर दस - बीस लाख अन्य लोगो के लिए रोजगार की उपलब्धता सुनिश्चित करती है | अर्थात एक चीनी मिल लगभग चालीस से पचास लाख आबादी की खुशहाली सुनिश्चित करती है | अगर किसी कारण बस मिल दो चार करोड़ सलाना घाटे में भी जाने लगती है तो लोक कल्याणकारी सरकारे पचास लाख लोगो के हितो को ध्यान में रखते हुए उस मिल को बन्द नही करती बल्कि दो करोड़ की आपूर्ति सरकारी मद से करके पचास लाख लोगो के हितो की सुरक्षा करती है, जबकि दुकानदार या निजी क्षेत्र के मिल मालिक इसे तुरन्त बंद कर कर्मचारियों को बाहर कर देते है, नतीजन कर्मचारी, दुकानदार,किसान से मजदूर लगभग पचास लाख आबादी की खुशहाली मिट्टी में मिल जाती है | अर्थात लोक कल्याणकारी सरकार आम जनमानस की खुशहाली सुनिश्चित करने के लिये नुकसान या घाटे की स्थिति में भी मिलों, कारखानों को बन्द नही करती जबकि दुकानदार ठीक इसके विपरीत तुरन्त बन्द कर लाखो आबादी की खुशहाली नष्ट कर देती है |सार रूप में यह कहा जा सकता है कि लोक कल्याणकारी सरकारों का चरित्र समाजवादी होता है जबकि दुकानदारों का पूँजीवादी |
 पूंजीवादी व्यस्था का चरित्र समाजवादी न होकर लाभकारी होता है | इसमे पूंजीपति वर्ग अपने लाभ का एक अल्प हिस्सा सामाजिक हितो के लिए उपलव्ध कराता है |  पूँजी वादी व्यस्था में सरकारें उधोगो के विकास के लिए सस्ते दरों पर पूँजीपतियों को जमीन, मशीनें, बिजली और लोंन  के रूप में पूँजी उपलव्ध कराती है | उधोगपति इस पूँजी से उधोग धन्धे स्थापित करते है और इन उधोग धन्धो में हुए मुनाफे के एक छोटे भाग को ही जन कल्याण में खर्च करते है | पूँजी वादी सरकारें इन पूँजी पतियों को गरीबी मिटने वाले घोषित करती है और रोजगार दाता के रूप में आवाम के सामने प्रस्तुत करती है | अर्थात गरीबी मिटने वाले मसीहा | परन्तु सच्चाई यह है कि उधोग व्यापार की हानि  की दशा में ये मसीहा भाग खड़े होते है और लाभ की दशा में भी ये कुल लाभ का एक बहुत छोटा हिस्सा ही जन कल्याण में खर्च करते है | भारत में जब संचार क्षेत्र का निगमीकरण किया जा रहा था तो यह बात जोर शोर से प्रसारित की जा रही थी कि रोजगार में अपार  वृद्धि होगी जबकि सच्चाई यह है कि निगमीकरण के बीस साल बाद भी सारी निजी क्षेत्र की कम्पनियां मिलकर सरकारी कम्पनी के कर्मचारियों के आधा भी कर्मचारियों की नियुक्ति नही की | अर्थात पूँजी वादी व्यस्था में पूँजीपतियों को गरीबी मिटने वाले मसीहा के रूप में जरूर प्रचारित किया जाता है परन्तु वास्तविकता में सरकारी पूँजी व्यय के सापेक्ष जनमानस को न के बराबर ही लाभ मिलता है | कल्याणकारी समाजवादी चरित्र की सरकारें जहाँ अपनी पूँजी से उधोग स्थापित कर करोड़ो लोगों को परोक्ष, अपरोक्ष रूप से लाभान्वित कर पाती है, वहीं पूँजी वादी सरकारें अरबो - खरबों पूँजीपतियों के विकास पर खर्च कर भी कुछ हजार लोगों को ही लाभान्वित कर पाती है और इस व्यवस्था में स्थायित्व का पूर्णतया अभाव रहता है | घाटे की दशा में पूँजी वादी तुरन्त भाग खड़े होते है | हमारी व्यस्था भी समाजवादी चरित्र से पूँजीवादी  चरित्र की तरफ अग्रसर है और गरीबी उन्मूलन की जिम्मेदारी सरकार सीधे न उठाकर पूँजीपतियों के कन्धे पर डाल रही है | जिसमे सरकार पूँजीपतियों को पूँजी और सहायता उनके विकास के लिये खर्च करेगी और गरीबी उन्मूलन और आवाम की खुशहाली सरकार की जिम्मेदारी न होकर पूँजीपतियों की जिम्मेदारी होगी |
 वर्तमान में सरकारी उपक्रमों को घाटे के नाम पर खत्म किया जा रहा है जो लोक कल्याणकारी सरकार के दर्शन के अनुरूप नही है | अगर कुछ करोड़ की क्षति पूर्ति से करोड़ो लोगो के जीवन में खुशहाली है तो समाजवादी चरित्र की सरकारों को इसकी क्षतिपूर्ति से कदम नही खिचना चाहिए | इन  उपक्रमों को निजी क्षेत्र को सौपनें से एक बहुत ही अल्प आवादी को ही रोजगार उपलव्ध हो पायेगा, क्योकि पूँजीवादी | चरित्र का मूल उदेश्य लाभ होता है और लाभ के लिये कम से कम लागत अनिवार्य है | कम से कम लागत का मतलब कम से कम रोजगार और वो भी कम से कम वेतन पर | अक्सर जनमानस में सरकारी कर्मियों की लापरवाही और अकर्मण्यता का भ्रम फैलाया जाता है, परन्तु नियोजन की नीतियों का निर्धारण जब सरकारों के ही हाथ में होता है तो इन नीतियों में सख्ती और तब्दीली कर लापरवाही और अकर्मण्यता पर अंकुश लगाया जा सकता है | सरकारी उपक्रमों का विनिवेश और बन्दी ही एक मात्र विकल्प नही है | अर्थात सरकारी उपक्रमों की दशा सुधार और उनके सशक्तिकरण में लोक कल्याणकारी दर्शन की उपेक्षा उचित नही है वरन करोड़ो जनमानस की खुशहाली सुनिश्चित करने हेतु सरकारी उपक्रमों को पुर्नजीवित कर समाजवादी दर्शन को सुनिश्चित करने की आवश्यकता है | लोक कल्याणकारी सरकार अपने दायित्व की पूर्ति किसी अन्य के सर पर नही टाल सकती | अगर सरकारी कर्मियों की पेन्सन खत्म की जा सकती है तो अकर्मण्य और लापरवाह कर्मचारियों को बाहर करने की नीति भी बनायी जा सकती है | हम कर्मचारियों की अकर्मण्यता पर बहस तो करते है परन्तु नौकरियों को खत्म हो जाने से आम जनमानस और युवा वर्ग के रोजगार की संभावना खत्म हो जाने के भयावह परिणाम पर बिलकुल ध्यान नही देते | अर्थात खुद गरीबों की दशा - सुधार की जिम्मेदारी न उठाकर  अन्य को इसकी जिम्मेदारी देना सरकार का पलायनवादी विचार है | लोक कल्याणकारी सरकार  जहाँ दस करोड़ के सरकारी उपक्रमों की क्षति पूर्ति से पचास लाख की आबादी की खुशहाली और समृद्धि सुनिश्चित कर लेती है, वही पूँजी वादी सरकारें दस करोड़ लाभांस प्राप्त कर मात्र कुछ हजार लोगो की ही खुशहाली सुनिश्चित कर पाती है | 
 कल्याणकारी सरकार को सरकारी उपक्रमों को बन्द करने अथवा बेचने की बजाय बढावा देना चाहियें | अभी सभी सरकारी उपक्रमों को बन्द करने की जो प्रक्रिया चल रही है यह बहुत ही घातक सिद्ध होगी क्योकि निजी हाथों में जाने के बाद इन सेवाओं पर मूल्य नियंत्रण नामुमकिन हो जायेगा और जो करोड़ो की आबादी परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से लाभान्वित हो रही है, उस पर सीधी बेरोजगारी की मार पड़ेगी | लोगो की क्रय शक्ति  शून्य हो जायेगी जो देश की उत्पादकता और जी0डी0पी0 को तहस - नहस कर देगी | उत्पादकता को प्रोत्साहित करने हेतु सरकार को समस्त उत्पादों का समर्थन मूल्य घोषित कर उनकी खरीद सुनिश्चित करनी चाहियें, चाहे वो कृषि उत्पाद हो, ओधोगिक उत्पाद हो या अन्य कोई भी उत्पाद | यदि हर उत्पाद में उत्पादक को एक निश्चित लाभांस प्राप्त होगा तो निश्चित रूप से जी0डी0पी0 में गुणात्मक सुधार होगा और आवाम की क्रय शक्ति बढेगी | सरकार को किसी भी कीमत पर किसी पूंजीपति को उत्पादन के लागत मूल्य से कम दाम पर अपने उत्पाद बेचने की अनुमति नही देना चाहिए अन्यथा हजारो लघु एंव मध्यम उधोग संचार कम्पनियों जैसे धरासायी हो जायेगे और लाखों लोग बेरोजगार | यह देखने को भी मिलता है  कि पूंजीवादी सरकारों वाले देश मंदी की दशा में बुरी तरह प्रभावित  हो जाते है  जबकि समाजवादी सरकारों पर इसका प्रभाव नामात्र ही पड़ता है | 2008 की वैश्विक मंदी का असर भारतीय जनमानस पर विल्कुल ही असर कारक नही रहा जबकी आज की सामान्य स्वदेसी मन्दी ने आम लोगो को बिस्कुट और साबुन, तेल में भी कटौती करने को बाध्य कर दिया है | समाजवादी चरित्र की व्यवस्था में लोग काम अथवा उत्पाद के बदले धन अर्जन करते है हलाँकि इसमे भी परोक्ष  रूप से सरकार की सहायता रहती है, जबकि पूँजीवादी व्यवस्था में दान के रूप में पूँजीपतियों द्वारा दिया धन सरकारें आम लोगो को उपलव्ध कराती है जो एक आत्म सम्मान विहीन और संवेदनहीन आवाम को पैदा करती है | अतः सरकारों को समाजवादी चरित्र का होना चाहिए और संवेदनहीन आवाम को पैदा करती है अतः सरकारों को समाजवादी चरित्र का होना चाहिए और संवेदनशील और स्वाभिमानी जनमानस को तैयार करना चाहिये न कि दुकानदारों जैसी लाभ हानि के आधार पर काम  करने वाली और संवेदनहीन और आत्म सम्मान विहीन आवाम तैयार करने वाली सरकार लोक कल्याणकारी होनी चाहिये दुकानदार जैसे लाभ हानि गिनने वाली नही |